धनतेरस के दिन कुबेर की नाभि में इत्र क्यों अर्पित किया जाता है, आईए जानें
Khabar Pradhan Desk
संवाददाता
17 October 2025, 1:16 PM
17 अक्टूबर 2025 : धनतेरस पर माता लक्ष्मी की गणेश जी के साथ पूजा अर्चना की जाती है। इसके साथ ही कुबेर जी की भी पूजा की जाती है। क्योंकि कुबेर को धन संचित करने वाले देवता माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव से कुबेर को धन के देवता का पद मिला था।
एक बार ब्रह्मा जी ने कुबेर से पूछा कि धन का संचित स्रोत कहां रहेगा। तब कुबेर जी ने कहा कि मेरा उदर बड़ा है।
उदर में स्थित नाभि में ही धन का संचित स्रोत होगा। यानि धन का केंद्र नाभि होगा।
इस कारण धनतेरस के दिन कुबेर देवता की नाभि पर इत्र और पुष्प अर्पित करके धन और समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है।
उज्जैन के संदीपनी आश्रम के पास प्राचीन कुबेर देवता की प्रतिमा है स्थित:
संदीपनी आश्रम में श्री कृष्ण ने शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब गुरु दक्षिणा का समय आया। तब गुरु ने श्री कृष्ण को यह आदेश दिया कि वह शंखासुर से उनके पुत्र को मुक्त करायें। गुरु के पुत्र को मुक्त कराने के बाद गुरु माता ने प्रसन्न होकर कृष्ण को श्री की उपाधि का वरदान दिया । जिससे कृष्ण श्री कृष्ण कहलाए।
वही गुरु दक्षिणा के रूप में कुबेर देवताओं की ओर से धन-धान्य लेकर आश्रम पहुंचे । किंतु गुरु संदीपनी ने वह खजाना लौटा दिया। और फिर कुबेर जी वही सांदीपनि आश्रम के पास महाकालेश्वर मंदिर के कौटितीर्थ कुंड के समीप कुबेर देवता विराजमान हो गए।
संदीपनी आश्रम परिसर में 84 महादेव में से 40 में क्रम पर श्री कुंडेश्वर महादेव मंदिर के गर्भ ग्रह में यह दुर्लभ कुबेर की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में कुबेर जी बैठे हुए हैं। एक हाथ में सोम पात्र है और दूसरा वरमुद्रा में है।
पुरातत्व विभाग के अनुसार यह प्रतिमा परमार कालीन है और लगभग 1100 वर्ष पुरानी है । इस प्रतिमा में कुबेर के कंधों पर धन की पोटली बनी हुई है। पेट उभरा हुआ है, तीखी नाक है और उनके शरीर की छवि ऐसी है जिससे बहुत ऐश्वर्या शाली प्रतीत होता है।
धनतेरस पर बड़ी संख्या में कुबेर जी की पूजा अर्चना करने के लिए लोग पहुंचते हैं और उनकी नाभि में घी और इत्र लगाकर पुष्प समर्पित करके धन ऐश्वर्या और सौभाग्य की कामना करते हैं।