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घर में कहां लगाएं पितरों की तस्वीर: उपयुक्त दिशा और वैज्ञानिक महत्व जानें

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Khabar Pradhan Desk

संवाददाता

13 September 2025, 1:16 PM

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घर में कहां लगाएं पितरों की तस्वीर: उपयुक्त दिशा और वैज्ञानिक महत्व जानें

13 सितंबर 2025: पितरों की तस्वीर की उपयुक्त दिशा और उसका वैज्ञानिक महत्व

वास्तु शास्त्र में घर की हर वस्तु और स्थान का गहरा प्रभाव माना जाता है। पितरों (पूर्वजों) की तस्वीरों के संबंध में भी विशेष नियम बताए गए हैं। प्राचीन ग्रंथों और वास्तु सिद्धांतों के अनुसार पितरों की तस्वीरें दक्षिण दिशा में लगानी सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। इसका कारण यह है कि दक्षिण दिशा का अधिपति यमराज को माना गया है, और यम ही पितरों के संरक्षक माने जाते हैं। इसलिए यह दिशा पितरों को समर्पित मानी जाती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व:

जब हम पितरों की तस्वीर किसी निश्चित स्थान पर रखते हैं, तो वह परिवार के सदस्यों में मानसिक अनुशासन और भावनात्मक संतुलन पैदा करता है। दक्षिण दिशा को प्राचीन भारतीय वास्तु में स्थिरता और विराम की दिशा कहा गया है। पितरों की तस्वीर वहाँ रखने से मनुष्य को यह संकेत मिलता है कि जीवन के बाद मृत्यु भी एक सत्य है और हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। इस प्रकार यह अभ्यास परिवार को जोड़ने और संस्कारों को बनाए रखने में मदद करता है।

यदि पितरों की तस्वीरें गलत दिशा में लगाई जाएँ—जैसे कि उत्तर या पूर्व में—तो मानसिक अस्थिरता, अनावश्यक चिंताएँ और घर के वातावरण में उदासी बढ़ सकती है। यह सीधे-सीधे मनोविज्ञान से जुड़ा प्रभाव है क्योंकि बार-बार नज़र पड़ने पर व्यक्ति अवचेतन में पितरों की याद से भावुक हो जाता है।

पूजा घर में पितरों की तस्वीरें क्यों न रखें?

शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा स्थान केवल देवताओं और ईश्वर की उपासना के लिए होना चाहिए। देवता और पितरों का स्थान अलग माना गया है। देवताओं की पूजा से हमें ऊर्जा, प्रेरणा और सकारात्मकता मिलती है, जबकि पितरों की स्मृति से हमारी श्राद्ध और तर्पण की भावना जुड़ी हुई है। इन दोनों को एक स्थान पर रखना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता।

शास्त्रीय तर्क:

धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि देवता "ऊर्ध्वगामी" ऊर्जा का प्रतीक हैं जबकि पितर "पितृलोक" के वासी माने जाते हैं। पूजा घर में पितरों की तस्वीर रखने से दोनों ऊर्जाओं का मिलन होता है, जो अनुचित माना जाता है। इसलिए पूजा घर में केवल देवताओं की मूर्तियाँ या चित्र रखने चाहिए और पितरों की तस्वीर अलग दक्षिण दिशा वाली दीवार पर लगानी चाहिए।

वैज्ञानिक तर्क:

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पूजा घर एक ऐसा स्थान होता है जहाँ व्यक्ति ध्यान, जप और सकारात्मक ऊर्जा पर केंद्रित होता है। पितरों की तस्वीर वहाँ होने से व्यक्ति का ध्यान भक्ति की बजाय शोक या स्मृतियों की ओर चला जाता है। यह मानसिक शांति और ध्यान की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से भी दोनों को अलग-अलग रखना मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ माना गया है।

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