धर्म के नाम पर अंधविश्वास को कोर्ट रोक सकता है.. सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

khabar pradhan

संवाददाता

9 April 2026

अपडेटेड: 5:30 PM 0thGMT+0530

धर्म के नाम पर अंधविश्वास को कोर्ट रोक सकता है.. सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

9 अप्रैल 2026

नई दिल्ली:
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और परंपराओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बहुत ही अहम बहस छिड़ गई है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक बड़ी बात कही है कि उसे यह तय करने का पूरा हक है कि किसी धर्म में चल रही कोई खास परंपरा वाकई आस्था का हिस्सा है या वह सिर्फ एक अंधविश्वास है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने साफ किया कि वह उन प्रथाओं में दखल दे सकता है जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाती हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई परंपरा संविधान के नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। यानी कोर्ट यह जांच सकता है कि क्या कोई नियम कानून के दायरे में सही है या नहीं। यह मामला मुख्य रूप से सबरीमाला मंदिर में एक निश्चित उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक से जुड़ा है।
केंद्र सरकार का विरोध: कोर्ट तय न करे धर्म के नियम
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट की इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि:
1. कोई अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कौन सी धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है और कौन सी नहीं।
2. यह काम विधायिका (संसद) का है कि वह जरूरत पड़ने पर धर्म सुधार के लिए कानून बनाए।
3. धर्मनिरपेक्ष अदालत को धार्मिक बारीकियों में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं।
पूरी बहस किस बारे में है
यह पूरी सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की एक बड़ी बेंच कर रही है। कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा सकता है।
जस्टिस नागरत्ना ने इस दौरान एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि सबरीमाला मामले में किसी असली भक्त ने याचिका क्यों नहीं लगाई? क्या किसी तीसरे पक्ष (Third Party) की अर्जी पर इस तरह के धार्मिक मामलों में सुनवाई होनी चाहिए?
क्या है आगे का रास्ता
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अब अदालत ऐसी जनहित याचिकाओं (PIL) को लेकर बहुत सतर्क हो गई है। कोर्ट का मानना है कि भारतीय समाज की सोच बदल रही है और न्यायपालिका को उसी के अनुसार संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी होगी। फिलहाल इस मुद्दे पर बहस जारी है और कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि आस्था और कानून के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए।

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