बस्तर में खत्म हुआ ‘लाल आतंक’: अब बंदूकों की जगह विकास की गूंज, जानें कैसे बदल रही है तस्वीर

khabar pradhan

संवाददाता

1 April 2026

अपडेटेड: 3:08 PM 0stGMT+0530

बस्तर में खत्म हुआ ‘लाल आतंक’: अब बंदूकों की जगह विकास की गूंज, जानें कैसे बदल रही है तस्वीर


1 अप्रैल 2026
रायपुर/बस्तर: दशकों तक हिंसा और डर के साये में जीने वाला छत्तीसगढ़ का बस्तर अब एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जिस इलाके की पहचान कभी ‘नक्सलवाद’ से होती थी, वहां अब शांति और तरक्की की नई सुबह दिखाई दे रही है। केंद्र और राज्य सरकार के कड़े संकल्प और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने नक्सलियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।

आंकड़ों में देखिए बदलाव की कहानी (पिछले 12 वर्षों का लेखा-जोखा):
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, बस्तर में बुनियादी सुविधाओं को घर-घर पहुँचाया जा रहा है:
* सड़कें और कनेक्टिविटी: 17,589 किमी सड़कों की मंजूरी मिली, जिसमें से 12,000 किमी बनकर तैयार हैं।
* डिजिटल क्रांति: गांवों में 5,000 मोबाइल टावर लगाए गए हैं और 1,321 एटीएम खोले गए हैं।
* शिक्षा और कौशल: युवाओं के लिए 259 एकलव्य विद्यालय, 49 स्किल डेवलपमेंट सेंटर और 46 आईटीआई (ITI) खोले गए हैं।
* बैंकिंग और डाक: 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट और 6,025 डाकघर अब दूर-दराज के इलाकों में सेवा दे रहे हैं।
* सुरक्षा: नक्सलियों पर नकेल कसने के लिए 596 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन और 406 नए सुरक्षा कैंप बनाए गए हैं।

नक्सली संगठन हुए कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में जहां 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, वहीं अब यह संख्या सिमटकर बहुत कम रह गई है।
* पिछले तीन सालों में 4,839 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और मुख्यधारा में शामिल हुए।
* 2,218 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 706 मारे गए।
* नक्सली संगठनों की ‘सेंट्रल कमेटी’ और ‘डंडकारण्य स्टेट कमेटी’ जैसे बड़े समूह अब बिखरने की कगार पर हैं।

क्या है सरकार का ‘विकास एजेंडा’?
बस्तर को 2030 तक एक विकसित क्षेत्र बनाने के लिए सरकार 5 मुख्य बिंदुओं पर काम कर रही है:
* हर गांव तक सड़क: हर बसावट को पक्की सड़कों से जोड़ना।
* बुनियादी सुविधाएं: बिजली, साफ पानी और स्कूलों की शत-प्रतिशत पहुंच।
* रोजगार: स्थानीय युवाओं को उद्योगों और सरकारी योजनाओं के जरिए काम देना।
* स्वास्थ्य: बस्तर के अंतिम छोर तक अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का जाल बिछाना।
* संस्कृति का संरक्षण: बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और वनों को बचाते हुए पर्यटन को बढ़ावा देना।

50 साल की समस्या, 2 साल में समाधान का लक्ष्य
हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर के हालात पर चर्चा करते हुए एक ‘सीक्रेट रोडमैप’ साझा किया था। सरकार का लक्ष्य था कि  2024 से  2 साल के भीतर यानी 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाए। गृह मंत्री ने साफ कहा  था कि अब बातचीत का समय नहीं, बल्कि कार्रवाई और विकास का समय है।

जानिए उस सीक्रेट रोडमैप की कहानी जिसने बदल दी बस्तर की किस्मत

छत्तीसगढ़ का बस्तर, जो कभी हिंसा और डर की खबरों के लिए जाना जाता था, आज पूरी दुनिया के सामने जीत की एक नई मिसाल बनकर उभरा है। दशकों तक ‘लाल आतंक’ के साये में सिसकने वाला यह इलाका अब पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है। यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि इसके पीछे थी सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति, जवानों का शौर्य और जनता का अटूट भरोसा।
दिसंबर 2023: बस्तर की मुक्ति की कहानी दिसंबर 2023 से रफ्तार पकड़ती है। राज्य में नई सरकार के गठन के बाद केवल फाइलें नहीं चलीं, बल्कि एक ‘मजबूत संकल्प’ लिया गया। जनवरी 2024 की एक समीक्षा में चौंकाने वाला खुलासा हुआ था कि देश के कुल नक्सलवाद का 75% और सशस्त्र नक्सलियों का 90% हिस्सा अकेले छत्तीसगढ़ में सिमटा था। इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए सरकार ने एक ‘सीक्रेट रोडमैप’ तैयार किया।
जीत के 4 सबसे बड़े पिलर: जिसने नक्सलियों की कमर तोड़ दी
* हाईटेक इंटेलिजेंस और सटीक ऑपरेशन: अब सुरक्षा बल केवल साहस के दम पर नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक के दम पर जंगलों में उतरे। हाईटेक सर्विलांस और तकनीक की मदद से जवानों ने नक्सलियों की सटीक लोकेशन ट्रैक की, जिससे हमारे जवानों को बिना खरोंच आए बड़े ऑपरेशन सफल हुए।
* सम्मानजनक वापसी (सरेंडर नहीं, पुनर्वसन): सरकार ने एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव किया। ‘सरेंडर’ जैसे शब्दों को त्यागकर ‘ससम्मान पुनर्वसन’ की नीति अपनाई गई। इससे गुमराह युवाओं का भरोसा जीता गया। नतीजा यह हुआ कि पिछले 2 वर्षों में 3,000 नक्सलियों का पुनर्वास हुआ और 2,000 से ज्यादा की गिरफ्तारी हुई।
* सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रहार: बंदूक की लड़ाई के साथ-साथ सरकार ने बस्तर के लोगों के दिलों को जीता। ‘बस्तर ओलंपिक’ और ‘बस्तर पंडूम’ जैसे आयोजनों से युवाओं में नया जोश भरा गया। आकाशवाणी के जरिए स्थानीय बोलियों में बोडोलैंड जैसे सफल आंदोलनों की कहानियां सुनाई गईं, जिससे नक्सली विचारधारा पूरी तरह खोखली हो गई।
* विकास का दर्शन: बस्तर के युवाओं को राजधानी रायपुर ले जाकर उन्हें आधुनिक विकास से रूबरू कराया गया। जब उन्होंने सड़क, बिजली, टावर और बेहतर अस्पतालों की ताकत देखी, तो उन्होंने खुद ही हिंसा का रास्ता ठुकरा दिया।

किसे मिला इस जीत का क्रेडिट?
प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस जीत का सबसे बड़ा श्रेय बस्तर की जनता को दिया है। उन्होंने कहा कि बस्तर के लोगों ने अब ‘लाल आतंक’ को नकार कर विकास के रास्ते को चुना है। इसके साथ ही:
* सुरक्षा बलों के जवानों का अद्भुत पराक्रम।
* समाज प्रमुखों और पंचायत प्रतिनिधियों का सक्रिय सहयोग।
* पत्रकारों की निडर रिपोर्टिंग, जिसने सच को सामने रखा।

अब कैसा है आज का बस्तर?
आज बस्तर के अंतिम छोर तक सड़कें पहुँच चुकी हैं। जहां कभी नक्सलियों की अदालत लगती थी, वहां अब स्कूल और अस्पताल चल रहे हैं। 536 नक्सलियों को न्यूट्रलाइज कर और हजारों को मुख्यधारा में शामिल कर अब पूरे क्षेत्र में तिरंगा शान से लहरा रहा है।
बस्तर की यह जीत केवल एक क्षेत्र की जीत नहीं है, बल्कि यह जीत है उस भरोसे की जो एक आम आदमी ने लोकतंत्र पर जताया है। 50 साल का संघर्ष अब शांति की एक नई सुबह में बदल चुका है।

अब वह समय दूर नहीं जब बस्तर की पहचान केवल उसके घने जंगलों और सुंदर संस्कृति से होगी, न कि बंदूकों की आवाज से। केंद्र और राज्य सरकार का यह साझा प्रयास बस्तर के साथ-साथ पूरे देश के लिए सुकून की खबर है।

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