सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की विवादित टिप्पणी पर जताई कड़ी नाराजगी

khabar pradhan

संवाददाता

15 April 2025

अपडेटेड: 1:15 PM 0thGMT+0530

रेप केस में पीड़िता को जिम्मेदार ठहराने पर लगाई फटकार

देश की सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक रेप केस में की गई आपत्तिजनक टिप्पणी पर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में रेप पीड़िता को ही घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए टिप्पणी की थी कि उसने “खुद अपने लिए मुसीबत बुलाई।” इस बयान को सुप्रीम कोर्ट ने न केवल असंवेदनशील बल्कि पूरी तरह अनुचित करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नाराजगी जाहिर करते हुए सभी जजों को ऐसी टिप्पणियों से बचने की सख्त हिदायत दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक रेप केस में सुनवाई के दौरान जमानत याचिका पर विचार करते हुए पीड़िता के चरित्र और व्यवहार पर टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता का आचरण ऐसा था कि उसने स्वयं इस अपराध को न्योता दिया। इस टिप्पणी ने न केवल पीड़िता के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर किया, बल्कि सामाजिक और कानूनी हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए यह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा, जहां जजों ने इस टिप्पणी को गलत और पीड़िता के सम्मान के खिलाफ माना। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जमानत देना या न देना जज का विशेषाधिकार हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पीड़िता को दोषी ठहराया जाए या उसके चरित्र पर सवाल उठाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा, “न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता और पीड़ितों के प्रति सम्मान का होना अत्यंत आवश्यक है। ऐसी टिप्पणियां न केवल पीड़िता को अपमानित करती हैं, बल्कि समाज में गलत संदेश भी देती हैं।” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि रेप जैसे गंभीर अपराधों में पीड़िता को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जजों को भविष्य में ऐसी भाषा और टिप्पणियों से बचने की चेतावनी दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक फैसले निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होने चाहिए, न कि व्यक्तिगत धारणाओं या सामाजिक रूढ़ियों पर।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बन गया है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और आम नागरिकों ने इस कदम की सराहना की है। ट्विटर (X) पर #JusticeForVictims जैसे हैशटैग ट्रेंड करते देखे गए, जहां लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को लैंगिक हिंसा के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इस फैसले को ऐतिहासिक करार देते हुए कहा कि यह न केवल पीड़िताओं को न्याय दिलाने में मदद करेगा, बल्कि न्यायिक प्रणाली में लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देगा। एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने टिप्पणी की, “यह फैसला उन जजों के लिए एक सबक है जो अनजाने में या जानबूझकर पीड़िता को दोषी ठहराने की मानसिकता रखते हैं।”
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर रेप और लैंगिक हिंसा के मामलों में पीड़ितों के प्रति समाज और न्यायिक तंत्र की जिम्मेदारी को रेखांकित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले न केवल जजों को अपनी भाषा और दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करेंगे, बल्कि पीड़िताओं को भी बिना डर के न्याय मांगने का हौसला देंगे।
इसके साथ ही, यह मामला न्यायिक प्रशिक्षण और जजों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता पर कार्यशालाओं की आवश्यकता को भी उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई मौकों पर जजों को पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और सम्मान के साथ व्यवहार करने की सलाह दी है, और यह फैसला उसी दिशा में एक और कदम है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट की गलती को सुधारता है, बल्कि पूरे देश की न्यायिक प्रणाली को एक संदेश देता है कि रेप जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता के साथ पूरी संवेदनशीलता और निष्पक्षता बरती जानी चाहिए। यह फैसला लैंगिक समानता और न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।

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