अध्यात्म और संस्कृति के मार्ग से विश्व का मार्गदर्शन करेगा भारत: डॉ. मोहन भागवत
संवाददाता
25 March 2026
अपडेटेड: 1:00 PM 0thGMT+0530
25 मार्च 2027
वृंदावन:
संघर्षों की जड़ में केवल अहंकार, बदले की भावना और स्वार्थ
रुक्मिणी विहार स्थित जीवनदीप आश्रम के लोकार्पण के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने वैश्विक और राष्ट्रीय मुद्दों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने वर्तमान समय में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्धों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन संघर्षों की जड़ में केवल अहंकार, बदले की भावना और स्वार्थ छिपा है। डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि युद्ध में शामिल पक्ष यह भली-भांति जानते हैं कि इससे केवल विनाश होगा, फिर भी स्वार्थवश वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और बाद में पछतावा कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न देशों की विचारधाराओं की तुलना करते हुए कहा कि जहाँ अमेरिका और चीन अपनी बात को ही सही मानकर दुनिया को अपने पीछे चलाने की कोशिश करते हैं, वहीं भारत की संस्कृति ‘सभी सही हैं’ के सिद्धांत पर टिकी है। इसी आध्यात्मिक दृष्टि के कारण भारत पूरी दुनिया को एक नया रास्ता दिखाने की क्षमता रखता है।
गृहस्थों के कल्याण हेतु तीन संतानें आवश्यक
देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक नीतियों पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने जनसंख्या नीति में बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने चिकित्सकों के मत का हवाला देते हुए बताया कि जिस परिवार में तीन बच्चे होते हैं, वहाँ माता-पिता के स्वास्थ्य और भविष्य की सुरक्षा की गारंटी बढ़ जाती है। डॉ. भागवत का मानना है कि समान नागरिक कानून को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए पहले लोगों को इस बात के लिए भरोसे में लेना होगा कि गृहस्थों के कल्याण हेतु तीन संतानें आवश्यक हैं। इसके साथ ही उन्होंने अवैध घुसपैठ पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि देश में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करना अनिवार्य है। उन्होंने सुझाव दिया कि देश के नागरिकों के अधिकारों के हनन को रोकने के लिए ऐसे बाहरी व्यक्तियों को किसी भी प्रकार का काम या रोजगार नहीं दिया जाना चाहिए।
भारतीय जीवन पद्धति में आश्रम व्यवस्था का महत्व
भारतीय जीवन पद्धति में आश्रम व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने इसे जीवन विद्या सीखने वाली पहली पाठशाला बताया। डॉ. भागवत ने कहा कि आश्रम ही वह स्थान है जहाँ पुरुषार्थ के साथ जीवन जीने की कला सिखाई जाती है और यहाँ से निकले तेजस्वी एवं बलशाली युवा सौ वर्षों तक समाज की सेवा करने का सामर्थ्य रखते हैं। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि वर्तमान समय में आश्रम व्यवस्था की इस महान परंपरा को संभालने और आगे ले जाने वाले लोगों की संख्या में कमी आ रही है, जिसे फिर से मजबूत करने की आवश्यकता है।