उप-राष्ट्रपति धनखड़ का बयान: संसद सर्वोच्च, सांसद हैं देश के असली मालिक

khabar pradhan

संवाददाता

22 April 2025

अपडेटेड: 12:29 PM 0ndGMT+0530

नई दिल्ली, 22 अप्रैल 2025: उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारतीय लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता पर जोर देते हुए कहा कि संसद देश की सबसे बड़ी संस्था है और इसके ऊपर कोई अन्य संस्था नहीं है। उन्होंने सांसदों को देश का असली मालिक करार देते हुए कहा कि संसद जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करती है और लोकतंत्र का मूल आधार है। धनखड़ ने अपने बयान में संसद की गरिमा और उसके अधिकारों को रेखांकित करते हुए सांसदों से अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा के साथ निभाने का आह्वान किया।
उप-राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि संसद के निर्णय और अधिकार सर्वोपरि हैं, और यह देश के शासन तंत्र में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने लोकतंत्र की मजबूती के लिए संसद की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। धनखड़ ने कहा, “संसद केवल एक विधायी संस्था नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा है, जो जनता के विश्वास और आकांक्षाओं को दर्शाती है।”
इससे पहले, उप-राष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि शीर्ष अदालत ‘सुपर संसद’ की तरह काम कर रही है। उनके इस बयान ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया था। कुछ लोगों ने इसे न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव के रूप में देखा, जबकि अन्य ने इसे संसद की सर्वोच्चता को स्थापित करने की कोशिश के रूप में व्याख्या किया। अपने हालिया बयान में धनखड़ ने इस मुद्दे को और स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका मकसद किसी संस्था की आलोचना करना नहीं, बल्कि संसद की संवैधानिक भूमिका को रेखांकित करना था।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है, क्योंकि वे देश की नीतियों और कानूनों को आकार देते हैं। धनखड़ ने सांसदों से अपील की कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें और संसद की गरिमा को बनाए रखें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संसद को मजबूत करने से ही भारत का लोकतंत्र और सशक्त होगा।
उप-राष्ट्रपति के इस बयान को राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन के सवाल को फिर से उठाता है। जानकारों का मानना है कि धनखड़ का यह बयान संसद की संप्रभुता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।

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