“कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप की पेशकश”
संवाददाता
11 May 2025
अपडेटेड: 10:27 AM 0thGMT+0530
"कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप की पेशकश"
भारत और पाकिस्तान के बीच 10 मई 2025 को हुए युद्धविराम (सीजफायर) के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने सियासी हलकों में हंगामा मचा दिया है। ट्रंप ने कश्मीर मुद्दे को “हजारों साल पुराना” बताते हुए दावा किया कि वह भारत और पाकिस्तान के साथ मिलकर इसका समाधान निकाल सकते हैं। इस बयान ने जहां भारत में विवाद को जन्म दिया, वहीं सोशल मीडिया पर भी जनता की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
ट्रंप ने क्या कहा?
11 मई 2025 को डोनाल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट और प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत-पाकिस्तान सीजफायर की तारीफ की। उन्होंने लिखा, “भारत और पाकिस्तान, दोनों ताकतवर देशों ने समझदारी दिखाई। मैं दोनों के साथ मिलकर काम करूंगा ताकि कश्मीर जैसे पुराने मुद्दे का कोई हल निकाला जा सके।” ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इस सीजफायर को अपनी कूटनीतिक जीत मानते हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार व शांति को बढ़ावा देना चाहते हैं।
हालांकि, ट्रंप के इस बयान में कश्मीर को “विवाद की जड़” बताने और अमेरिकी मध्यस्थता की पेशकश ने भारत में भूचाल ला दिया। भारत ने हमेशा कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा माना है और किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज किया है।
भारत की प्रतिक्रिया: कड़ा रुख
ट्रंप के बयान के कुछ ही घंटों बाद, भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और इस पर किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी स्वीकार्य नहीं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “भारत-पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से ही होगा। कश्मीर पर भारत का रुख स्पष्ट और अटल है।” सूत्रों के मुताबिक, भारत ने इस बयान पर अमेरिका से कूटनीतिक स्तर पर स्पष्टीकरण मांगा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 11 मई को एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर सीजफायर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा की, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और सेना प्रमुख शामिल थे। यह बैठक ट्रंप के बयान के जवाब में भारत की रणनीति को और मजबूत करने का संकेत देती है।
पाकिस्तान का रुख: मौके की तलाश
पाकिस्तान ने ट्रंप के बयान का तुरंत स्वागत किया और इसे कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने का मौका माना। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम कश्मीर पर तटस्थ मध्यस्थता का समर्थन करते हैं।” हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस बयान का इस्तेमाल अपनी आतंकी गतिविधियों को छिपाने और भारत पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है। सीजफायर के कुछ घंटों बाद ही जम्मू-कश्मीर में संदिग्ध आतंकी गतिविधियों की खबरें आईं, जिसने भारत की चिंताओं को और गहरा दिया।
कश्मीर पर ट्रंप का इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने कश्मीर पर टिप्पणी की है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी ट्रंप ने कश्मीर को “हजारों साल पुराना मुद्दा” बताया था और दोनों देशों से इसे सुलझाने की बात कही थी। उस समय भी भारत ने उनके बयान को खारिज कर दिया था। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप की यह रणनीति अमेरिका को भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ की भूमिका में लाने की कोशिश है, ताकि वह दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीतिक पकड़ मजबूत कर सकें।
विशेषज्ञों की राय: खतरे की घंटी
सामरिक विशेषज्ञों ने ट्रंप के बयान को भारत के लिए चेतावनी माना है। रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने कहा, “कश्मीर पर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। भारत को अपनी कूटनीति और सैन्य ताकत से इसका जवाब देना होगा।” वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का बयान उनकी घरेलू राजनीति को चमकाने की कोशिश हो सकती है, क्योंकि वह अमेरिकी चुनावों से पहले विदेश नीति में अपनी उपलब्धियां गिनाना चाहते हैं।
क्या है आगे की कूट नीतियां
ट्रंप का यह बयान भारत के लिए कई चुनौतियां खड़ी करता है। भारत को न केवल कूटनीतिक स्तर पर इस बयान का जवाब देना होगा, बल्कि सीमा पर अपनी सैन्य तैयारियों को भी मजबूत करना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को चाहिए:
कूटनीतिक जवाब:
वैश्विक मंचों पर कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताने की रणनीति को और मजबूत करना।
सैन्य सतर्कता:
जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए खुफिया तंत्र को और सक्रिय करना।
सार्वजनिक समर्थन:
सोशल मीडिया और जनता के बीच कश्मीर पर भारत के रुख को और स्पष्ट करना।
भारत का दृढ़ संकल्प
ट्रंप का कश्मीर पर बयान भले ही विवादास्पद हो, लेकिन भारत ने बार-बार साबित किया है कि वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। सीजफायर के बाद भारत की उच्चस्तरीय बैठक और विदेश मंत्रालय का बयान इस बात का प्रमाण है कि देश हर चुनौती के लिए तैयार है। क्या ट्रंप का यह बयान भारत-पाक संबंधों में नया मोड़ लाएगा, या यह केवल एक कूटनीतिक शोर साबित होगा? आपकी राय क्या है? अपनी प्रतिक्रिया हमारे साथ साझा करें।