किस दिन है वरुथिनी एकादशी जानिए तिथि और पूजा विधि…

khabar pradhan

संवाददाता

21 April 2025

अपडेटेड: 10:50 AM 0stGMT+0530

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। बैसाख का महीना भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को समर्पित होता है। बैसाख माह की एकादशी मोहिनी एकादशी या वरुथिनी एकादशी कहलाती हैं ।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस एकादशी को व्रत करने से सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है। और जीवन खुशहाल होता है ।

आईए जानते हैं —
वरुथिनी एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त :

वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर वरुथिनी एकादशी व्रत किया जाता है।
इस तिथि की शुरुआत 23 अप्रैल 2025 को शाम 4:45 से शुरू हो रही है वहीं इस तिथि का समापन 24 अप्रैल को दोपहर 2:32 पर होगा ।
ऐसे में 24 अप्रैल को वरुथिनी एकादशी व्रत किया जाएगा और अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर वरुथिनी एकादशी व्रत का पारण किया जाएगा।
25 अप्रैल को व्रत पारण करने का समय सुबह 5:46 से लेकर सुबह 8:23 तक है।

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार मांधाता नाम के राजा के पैर को एक जंगली भालू ने काट लिया जिससे राजा बेहद डर गया ।इस स्थिति में राजा ने श्री हरि जी से जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना की। भगवान ने राजा से वरुथिनी एकादशी व्रत करने की सलाह दी। राजा ने विधि पूर्वक व्रत किया ।व्रत के शुभ फल की प्राप्ति से राजा का शरीर सुंदर शरीर वाला हो गया ।
वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। साथ ही पापों का अंत भी होता है।

पूजन विधि :

(1) व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें ।स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहन कर व्रत का संकल्प लें ।भगवान सूर्य को अर्घ्य दें ।

(2)एक चौकी लें ,उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति माता लक्ष्मी के साथ स्थापित करें।

3)दक्षिणावर्ती शंख में दूध और जल भर कर उससे विष्णु जी का अभिषेक करें ।भगवान को नारियल अर्पित करें ।माता लक्ष्मी को पान अर्पित करें।

(4)उन्हें पीले पुष्प, फल, चंदन तुलसी दल, खीर और पंचामृत का भोग चढ़ाएं।

(5) वरुथिनी एकादशी कथा का पाठ करें, और आरती करें।
(6) भगवान श्री विष्णु की पूजा में शंख का प्रयोग करके शंख में गंगाजल भरकर पूरे घर में गंगाजल छिड़कना चाहिए । गंगाजल को घर में छिड़कने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

(7) इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम ,भगवत गीता का 11वां अध्याय का पाठ करें ।यदि पाठ संभव न हो तो
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
ॐ विष्णवे नमः या विष्णु जी के किसी भी मंत्र का जाप करें।

(8)इसके बाद तुलसी जी की पूजा करें । पूजा करते समय तुलसी के पत्ते ना तोड़े ।एक दिन पूर्व तुलसी के पत्तों को तोड़ कर रख लें ।

   इसके अलावा पीपल के वृक्ष की पूजा करें। एक लोटे में कच्चा दूध और जल मिलाकर ,फिर उसे पीपल की जड़ में अर्पित करें । केले के  पेड़ की पूजा करें। अंत में देवी देवताओं की आरती करके पूजा का समापन करें।

शाम को घर के मुख्य दरवाजे पर ,घर के मंदिर में ,घर की तिजोरी में, घर के ईशान कोण में ,तुलसी के पौधे के पास एक-एक दीपक जलाएं ।साथ ही शिवलिंग पर काले तिल अर्पित करें।

द्वादशी के दिन स्नान के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और गरीबों को पीली वस्तुओं का दान करें।

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