जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी में MBBS के रिजल्ट में गड़बड़ी, सही जवाब पर जीरो, गलत पर दिये नंबर:
संवाददाता
11 April 2026
अपडेटेड: 5:41 PM 0thGMT+0530
11 अप्रैल 2026:
मध्य प्रदेश /जबलपुर/
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के दो जजों ने सॉफ्टवेयर का डेमो देखकर मांगा जवाब:
जबलपुर मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी की परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली में गंभीर गड़बड़ी का खुलासा हाई कोर्ट की सुनवाई में हुआ है। ई-वैल्यूएशन सॉफ्टवेयर की खामियों के कारण एमबीबीएस हो या कोई अन्य कोर्स में पढ़ाई कर रहे सभी छात्रों के रिजल्ट प्रभावित हो रहे हैं।
कोर्ट में पेश डेमो और रिकॉर्ड से सामने आया कि कई मामलों में सही जवाब देने वाले छात्रों को जीरो अंक दिए, जबकि गलत उत्तर पर नंबर मिल गए। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने खुद सॉफ्टवेयर का परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि मूल्यांकन के बाद यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि किस आधार पर अंक दिए गए।
दरअसल से जबलपुर मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी के एमबीबीएस से लेकर अन्य डिग्री का एग्जाम देने वाले छात्रों के लिए माइंडलॉजिक इंफ्राटेक लिमिटेड का सॉफ्टवेयर लागू किया था। इस सॉफ्टवेयर में मेडिकल फील्ड की सभी डिग्रियों के लिए एग्जाम कंट्रोल किया जा रहा था।
पुन: मूल्यांकन के बाद भी जवाब संतोषजनक नहीं:
छात्रों ने मार्कशीट का पुनः मूल्यांकन कराया ,लेकिन संशोधित परिणाम भी संतोषजनक नहीं होने पर यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा । सुनवाई में कोर्ट ने परीक्षा नियंत्रक और सॉफ्टवेयर कंपनी माइंड लॉजिक इंफ्राटेक लिमिटेड के प्रतिनिधि को तलब किया। सॉफ्टवेयर का डेमो देने पर चौंकाने वाली खामियां सामने आई जिन उत्तरों पर क्रॉस था उन में अंक दिए गए । जबकि राइट चिन्हित जवाबों में नंबर नहीं मिले। यह भी पाया गया कि सही गलत का चिन्ह लगाना अनिवार्य नहीं है। और आंशिक अंक दर्ज करने का स्पष्ट प्रावधान भी नहीं है । इससे मूल्यांकन में मनमानी की गुंजाइश बनी रहती है।
हाईकोर्ट ने जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी से मांगा जवाब:
एक ही कॉपी… जितनी बार चेक हुई, अलग नंबर
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि एक ही छात्र की कॉपी अलग-अलग बार जांचने पर अलग अंक मिले। कहीं 5 अंक दिए गए, तो दूसरी बार वही घटकर जीरो हो गए। इससे यह संकेत मिला कि न सिर्फ सॉफ्टवेयर, बल्कि मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया में खामियां हैं।
विवि के डबल वैल्यूएशन का तर्क नहीं टिक सका:
यूनिवर्सिटी की ओर से डबल वैल्यूएशन की दलील दी गई, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को कमजोर कर दिया। साथ ही यह भी बताया गया कि मूल्यांकनकर्ताओं को प्रति ओएमआर शीट करीब 50 रुपए दिए जाते हैं, जिससे जल्दबाजी में जांच की आशंका भी बनी रहती है।
डिजिटल पेन से मार्किंग करें, और मूल्यांकन सुधारें:
कोर्ट ने इस स्थिति को छात्रों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बताया। बेंच ने निर्देश दिए कि मूल्यांकन प्रणाली में सुधार किया जाए और डिजिटल पेन के जरिए सही-गलत की स्पष्ट मार्किंग अनिवार्य की जाए, ताकि हर अंक का आधार ट्रैक किया जा सके। हाई कोर्ट ने यूनिवर्सिटी से अगली सुनवाई में विस्तृत और संतोषजनक जवाब मांगा है।