जब भक्ति जीती और अहंकार हारा – होलिका और प्रह्लाद की सच्ची कहानी

khabar pradhan

संवाददाता

28 February 2026

अपडेटेड: 3:12 PM 0thGMT+0530

जब भक्ति जीती और अहंकार हारा – होलिका और प्रह्लाद की सच्ची कहानी

बहुत समय पहले एक असुर राजा था जिसका नाम हिरण्यकश्यप था। वह बहुत शक्तिशाली और घमंडी था। उसने कठोर तप करके भगवान से वरदान लिया कि उसे कोई इंसान, जानवर, दिन, रात, घर के अंदर या बाहर, जमीन या आकाश में नहीं मार सके। इस वरदान के कारण वह खुद को सबसे बड़ा और भगवान से भी ज्यादा शक्तिशाली मानने लगा। उसने अपने राज्य में यह आदेश दे दिया कि कोई भी भगवान का नाम नहीं लेगा, केवल उसी की पूजा करेगा।

लेकिन उसका बेटा प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। वह हर समय “नारायण-नारायण” का जाप करता था। हिरण्यकश्यप को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कई बार प्रह्लाद को समझाने की कोशिश की, डराया, धमकाया, लेकिन प्रह्लाद अपनी भक्ति से नहीं डिगा।

गुस्से में आकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए। कभी उसे पहाड़ से गिरवाया, कभी हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की, कभी जहरीले सांपों के बीच डलवा दिया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की। इससे हिरण्यकश्यप और ज्यादा क्रोधित हो गया।

तब उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान था कि आग उसे जला नहीं सकती। हिरण्यकश्यप ने योजना बनाई कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जल जाएगा और होलिका सुरक्षित बच जाएगी।

होलिका ने ऐसा ही किया। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। लेकिन प्रह्लाद पूरे विश्वास के साथ भगवान का नाम जपता रहा। कहते हैं कि वरदान का दुरुपयोग करने के कारण होलिका की शक्ति काम नहीं आई। वह आग में जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।

इस घटना से यह संदेश मिलता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास हमेशा बुराई पर विजय पाते हैं। भगवान अपने सच्चे भक्तों की रक्षा जरूर करते हैं। इसी खुशी में हर साल होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

इसके बाद हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि तुम्हारा भगवान कहां है। प्रह्लाद ने कहा कि भगवान हर जगह हैं। गुस्से में आकर हिरण्यकश्यप ने एक खंभे को लात मारी। उसी समय भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में उसी खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने वरदान की शर्तों के अनुसार संध्या समय, दरवाजे की चौखट पर, आधा मानव और आधा सिंह रूप में हिरण्यकश्यप का वध कर दिया।

इस तरह प्रह्लाद की भक्ति और विश्वास की जीत हुई और संसार को यह संदेश मिला कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर विश्वास सच्चा हो तो भगवान हमेशा साथ देते हैं।

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