भारत और चीन खड़े हुए एक साथ, कार्बन बॉर्डर टैक्स पर उठाया सवाल, जानिए पुरा मामला
संवाददाता
4 November 2024
अपडेटेड: 9:13 AM 0thGMT+0530
कार्बन बॉर्डर
यूरोपीय संघ का मानना है कि इससे उनके अपने उद्योगों को उन देशों के सस्ते उत्पादों के कारण होने वाले असमान प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिलेगी जो जलवायु मानकों का पालन नहीं करते हैं।
क्या है कार्बन बॉर्डर टैक्स?
कार्बन बॉर्डर टैक्स (Carbon Border Tax) एक तरह का कर है जिसे यूरोपीय संघ (EU) द्वारा प्रस्तावित किया गया है। इसका उद्देश्य उन देशों से आयातित उत्पादों पर अतिरिक्त कर लगाना है जहां जलवायु मानकों का पालन कम किया जाता है, जैसे कि उन देशों में जहां उत्पादन के दौरान ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है। इसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भी कहा जाता है।
यूरोपीय संघ का मानना है कि इससे उनके अपने उद्योगों को उन देशों के सस्ते उत्पादों के कारण होने वाले असमान प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिलेगी जो जलवायु मानकों का पालन नहीं करते हैं। लेकिन, भारत और चीन जैसे विकासशील देश इसे व्यापार के माध्यम से नियंत्रण करने की कोशिश के रूप में देखते हैं। यूरोपीय संघ के इस कर को लेकर कई देशों का मानना है कि ये उनके औद्योगिक विकास को बाधित करेगा।
खासकर उन देशों का जो अब भी औद्योगिक विकास के शुरुआती चरण में हैं और उनकी अर्थव्यवस्था कार्बन-उत्सर्जन पर निर्भर है। ये दोनों देश मानते हैं कि यह टैक्स, जो मुख्य रूप से विकासशील देशों पर लागू होगा, असल में एक प्रकार का व्यापारिक भेदभाव है जो उनके औद्योगिक विकास पर असर डाल सकता है।
भारत और चीन का विरोध
भारत और चीन जैसे देश इस टैक्स के खिलाफ इसलिए एकजुट हुए हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह टैक्स जलवायु परिवर्तन के नाम पर व्यापार में भेदभाव पैदा करेगा। इन देशों का तर्क है कि यूरोप के कई विकसित देशों ने पहले खुद औद्योगिक विकास के दौरान बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन किया है, और अब वे विकासशील देशों से उसी स्तर की जलवायु मानकों की अपेक्षा कर रहे हैं जो उनके लिए आर्थिक रूप से कठिन है।
कई विकासशील देशों का मानना है कि यूरोपीय देशों की यह नीति केवल पर्यावरणीय मुद्दों के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनका आर्थिक लाभ भी छिपा है। ये देश इस नीति को एक नई तरह की उपनिवेशवाद की चाल मानते हैं, जिसके तहत वे विकासशील देशों को पर्यावरण के नाम पर आर्थिक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
भारत और चीन इस मुद्दे पर एकसाथ आने के कारणों में शामिल हैं ये कुछ बाते-:
व्यापार असंतुलन – यह टैक्स विकासशील देशों के उत्पादों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को कम करेगा।
सार्वजनिक वित्त पर प्रभाव – कार्बन बॉर्डर टैक्स की वजह से इन देशों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि इन्हें उत्सर्जन कम करने के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता होगी।
आर्थिक विकास पर प्रभाव – इस कर का मतलब है कि कार्बन उत्सर्जन के नियमों का पालन करना विकासशील देशों के औद्योगिक विकास को प्रभावित कर सकता है।
यूरोपीय संघ की मंशा
यूरोपीय संघ का कहना है कि ये टैक्स जलवायु परिवर्तन को रोकने का एक उपाय है और दुनिया भर में उत्सर्जन को कम करने के लिए सभी देशों को समान रूप से जिम्मेदार होना चाहिए। लेकिन आलोचक इसे “क्लाइमेट कॉलोनियलिज्म” कहते हैं, यानी विकसित देशों का विकासशील देशों पर प्रभुत्व जमाने का एक प्रयास। इसलिए भारत और चीन जैसे देश यूरोपीय संघ की इस नीति का कड़ा विरोध कर रहे हैं और इसे अपने आर्थिक और औद्योगिक विकास में बाधा मानते हैं।