मकर संक्रांति पर विशेष:शैय्या पर लेटे भीष्म ने क्यों सही असहनीय पीड़ा
संवाददाता
9 January 2026
अपडेटेड: 8:20 PM 0thGMT+0530
मकर संक्रांति पर विशेष:
मकर संक्रांति का त्योहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। सूर्यदेव जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब ये पावन पर्व मनाया जाता है। और 14 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं, तो 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाया जाएगा ।
सूर्यदेव होते हैं उत्तरायण:
भारत में ये एक आध्यात्मिक और सासंकृतिक पर्व है । इस दिन सूर्य मकर राशि में उत्तरायण हो जाते हैं। जिसका बड़ा महत्व माना गया है। शास्त्रों में इस समय को देवताओं का काल माना गया है। कहते हैं सूर्य देव के उत्तरायण होते ही स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। इसे लेकर अलग अलग राज्यों में लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं ।
कुछ लोग मानते हैं उत्तरायण में मरने वालों को मोक्ष मिलता है, जबकि दक्षिणायन के सूर्य में मृत्यु होने वालों को जन्म-मरण के चक्र से दोबारा गुजरना होता है। हमारे यहां यदि किसी की मृत्यु तीज-त्योहारों पर हो जाती है तो उसे भ्रम की स्थिति में देखा जाता है। और त्योहार बनाने पर पाबंदी लग जाती है। कई बार लोगों के मन में ये सवाल भी उठता है कि अगर मकर संक्रांति के दिन किसी के मृत्यु हो जाती है, तो इसके मायने क्या हैं?
क्या मकर संक्रांति पर मृत्यु होने पर मिल सच में जाता है मोक्ष…
इस विषय पर अगर शास्त्रों की मानें तो मकर संक्रांति या सूर्य देव के उत्तरायण होने पर जब किसी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। क्योंकि उनकी आत्माएं बड़ी पुण्य मानी जाती हैं इसलिए मृत्यु के बाद ऐसी आत्माओं सीधे भगवान के श्रीचरणों में जगह मिलती है। इसी से जुड़ी है महाभारतकाल के भीष्म पितामह की काहनी। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था। जब महाभारत का युद्ध चल रहा था तब कौरवों की तरफ से भीष्म युद्ध लड़ रहे थे। और 10वें दिन पितामह भीष्म के शरीर को अर्जुन के बाणों ने बुरी तरह से छलनी कर दिया था। इसके बाद वो घायल होकर युद्धभूमि पर गिर गए थे।तब अर्जुन ने बाणों की शय्या बनाकर उनके घायल शरीर को सहारा दिया था। शैय्या पर लेटे भीष्म असहनीय पीड़ा सह रहे थे, लेकिन उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे. क्योंकि उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में थे।
शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन प्राण त्यागने के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। ये बात पितामह भीष्म को मालूम थी। इसलिए उन्होंने प्राण त्यागने के लिए सूर्य देव के उत्तरायण होने का इंतजार किया था। इसके बाद मकर संक्रांति पर जब सूर्य देव उत्तरायण हो गए तब उन्होंने प्राण त्यागे। ऐसा माना जाता है कि इस समय प्राण जाने पर आत्मा को परमागति प्राप्त होती है। मकर संक्रांति को लेकर पितामह भीष्म यही कथा जुड़ी है।