महाकाल को गर्मी से बचाने के लिए शुरू हुई ‘गलंतिका’ परंपरा, 11 मटकियों से बरसेगी शीतल जलधारा
संवाददाता
4 April 2026
अपडेटेड: 4:42 PM 0thGMT+0530
4 अप्रैल 2026
उज्जैन:
मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में विश्वप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकालेश्वर को गर्मी से राहत दिलाने के लिए मंदिर में सदियों पुरानी ‘गलंतिका’ (मिट्टी की मटकियां) बांधने की परंपरा शुरू हो गई है। वैशाख कृष्ण प्रतिपदा के शुभ अवसर पर शुक्रवार को भगवान महाकाल के शीश पर शीतल जलधारा प्रवाहित करने के लिए ये मटकियां बांधी गईं।
क्या है यह परंपरा?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, जब वैशाख का महीना शुरू होता है और गर्मी बढ़ने लगती है, तब भगवान शिव (जो स्वयं अग्नि स्वरूप भी माने जाते हैं) को शीतलता प्रदान करने के लिए उनके गर्भगृह में शिवलिंग के ठीक ऊपर मिट्टी के कलश लटकाए जाते हैं। इनसे बूंद-बूंद पानी लगातार शिवलिंग पर गिरता रहता है, जिसे ‘जलधारा’ या ‘गलंतिका’ कहा जाता है।
11 पवित्र नदियों का आह्वान
इस परंपरा की शुरुआत बड़े ही विधि-विधान से की गई। मंदिर के पुजारियों ने सबसे पहले मिट्टी की 11 मटकियों का पूजन किया। पूजन के दौरान देश की 11 पवित्र नदियों— गंगा, सिंधु, सरस्वती, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, सरयू, क्षिप्रा, गंडक और पुण्य सलिलाओं का आह्वान किया गया। यह माना जाता है कि इन मटकियों से गिरने वाला जल इन सभी पवित्र नदियों के समान फल देने वाला है।
इस बार 2 नहीं, 3 महीने तक चलेगी परंपरा
आमतौर पर यह परंपरा दो महीने (वैशाख और ज्येष्ठ) तक चलती है। लेकिन इस बार ज्येष्ठ अधिकमास होने के कारण, बाबा महाकाल पर यह शीतल जलधारा दो के बजाय तीन महीने तक प्रवाहित की जाएगी। भक्तों के लिए यह एक दुर्लभ संयोग है कि वे लंबे समय तक बाबा के इस शीतल स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे।
दर्शन का समय और व्यवस्था
जलधारा प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे से शुरू होकर शाम 5:00 बजे तक निरंतर चलती रहेगी।
इसकी शुरुआत तड़के 4:00 बजे होने वाली भस्म आरती के तुरंत बाद की गई।
शाम को होने वाली संध्या पूजा के समय इन मटकियों को हटा लिया जाता है और भगवान का भांग व सूखे मेवों से भव्य श्रृंगार किया जाता है। प्रशासन और मंदिर समिति ने बढ़ती गर्मी को देखते हुए दर्शनार्थियों के लिए भी विशेष इंतजाम किए हैं ताकि उन्हें भी शीतलता मिलती रहे।