मायावती को लगता है खाने में ज़हर का भय

khabar pradhan

संवाददाता

19 March 2025

अपडेटेड: 12:26 PM 0thGMT+0530

मायावती को लगता है खाने में ज़हर का भय

अपनी जान का सताता खतरा

बसपा सुप्रीमो मायावती एक बार फिर चर्चा में हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर मॉक ड्रिल की गई तो लोगों को लगा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। मायावती के सियासी सफर की कहानी जानते हैं।

अमेरिका की काली करतूतों को उजागर करने वाली खोजी वेबसाइट विकिलीक्स ने 2011 में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को तानाशाह और भ्रष्ट करार दिया था। 23 अक्टूबर, 2008 के एक केबल में कहा गया था कि मायावती को जब भी जरूरत होती, वह अपनी पसंद की सैंडल मंगवाने के लिए अपने एक निजी विमान को खाली मुंबई भेजा करती थीं। बसपा सुप्रीमो मायावती की सुरक्षा जांच के लिए नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स यानी एनएसजी ने मॉक ड्रिल की थी। इसके लिए पहले से तैयारी की गई थी। बताया जा रहा है कि इसकी सूचना मायावती को दी गई थी। ड्रिल से पहले हमेशा की तरह मायावती के आवास का गेट बंद था। अचानक गेट खुला और एनएसजी कमांडो आवास में दाखिल हुए। पीछे से एक एंबुलेंस भी दाखिल हुई। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अटकलें लगानी शुरू कर दीं कि क्या मायावती की तबीयत खराब है। भारत की दलित सियासत में मायावती की कहानी बेहद गजब है। जानते हैं उनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में।

मायावती को हमेशा अपनी जान का खतरा सताता रहता है। विकिलीक्स के केबल के मुताबिक, मायावती को यह डर लगता था कि कोई उनके खाने में जहर मिला देगा। इसीलिए उन्होंने फूड टेस्टर्स की नियुक्ति की थी। उनके खाना खाने से पहले कोई कर्मचारी उसे चखता है। इसके साथ ही मायावती के किचन में खाना बनाने वाले रसोइयों की निगरानी भी की जाती है। विकिलीक्स की स्थापना जूलियन असांजे ने की थी, जिन्हें पिछले साल ही रिहा किया गया था।

विकिलीक्स ने कहा था कि मायावती में असुरक्षा की भावना इतनी है उनके भोजन करने से पहले उसे एक कर्मचारी चखता है। उनकी रसोई में खाना बनाने वाले नौ रसोइयों की निगरानी होती है। मायावती घर से ऑफिस निकलने से पहले सड़क को धुलवाती हैं। केबल में यह भी कहा गया था कि सतीश मिश्रा ने अमेरिकी दूतावास के अफसरों से कहा था कि निजी तौर पर मायावती का झुकाव भ्रष्टाचार की ओर है। वह तानाशाह जैसा व्यवहार करती हैं।
विकिलीक्स के खुलासे में यह भी कहा गया था कि मायावती प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। उस वक्त मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि विकीलीक्स का मालिक पागल हो गया है। उसे पागलखाने भेज देना चाहिए। अगर उनकी सरकार के पास पागलखाने में जगह न हो तो हमारे आगरा के पागलखाने में भेज दें।

बीएसपी के घटते जनाधार के बीच उसके भविष्य को लेकर वर्षो से गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी अपना जनाधार वापस पाने के लिए क्या करेगी? मायावती सड़कों पर उतरती नहीं हैं, ऐसे में बीएसपी में भविष्य का नेतृत्व क्या होगा? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को अपने पाले में करने के लिए मुख्यधारा की पार्टियां तो कोशिश कर ही रही हैं, दूसरी तरफ नगीना लोकसभा सीट से सांसद चुने गए चंद्रशेखर भी इस पर दावा कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा को यूपी में एक भी सीट नहीं मिली थी। हालांकि, मायावती क्या मजबूत नेतृत्व खड़ा कर पाएंगी, ये सवाल भी उठ रहे हैं, मगर कैसे होगा, यह कोई नहीं जानता है?
हाल ही में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक समेत सभी अहम पदों से हटा दिया था। मायावती ने कहा कि अहम फैसले वह खुद लेंगी। मायावती ने यह भी कहा है कि जब तक वह जिंदा रहेंगी, तब तक उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि उनके लिए पार्टी पहले है और बाकी रिश्ते-नाते बाद में हैं।

2019 में मायावती ने आकाश को पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक बनाया था और अपने छोटे भाई यानी आकाश के पिता आनंद कुमार को बीएसपी का उपाध्यक्ष बनाया था।
इसके बाद से मायावती पर भाई-भतीजावाद के आरोप लग रहे थे। ऐसे आरोप पार्टी के भीतर और बाहर दोनों लग रहे थे। कई लोग यह भी कहते हैं कि पार्टी के पुराने नेता आकाश आनंद को लेकर बहुत सहज नहीं थे।
मायावती के फैसले पर चंद्रशेखर ने कहा था कि मुझे बाबा साहेब आंबेडकर की वो बात याद आती है कि अब रानी के पेट से राजा का जन्म नहीं होगा। मगर, मायावती ने इस बात उपेक्षा की। इससे बहुजनों के बीच ग़लत संदेश गया है। अब तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

मायावती ने 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की सांसद के रूप में भी काम किया था। मायावती के साधारण शुरुआत से उभरने को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ कहा है। 1993 में बसपा के संस्थापक कांशीराम ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और मायावती 1995 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वह भारत में अनुसूचित जाति की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। 1997 और 2002 में वह भाजपा के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री रहीं।

मायावती ने 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज से बीए की पढ़ाई की और 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित विधि संकाय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1976 में बीएड किया। वह दिल्ली के इंद्रपुरी जेजे कॉलोनी में एक टीचर थीं। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रही थीं, जब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के राजनेता कांशीराम 1977 में उनके घर आए। मायावती के जीवनी लेखक अजय बोस के अनुसार , कांशीराम ने मायावती से प्रभावित होकर कहा-मैं आपको एक दिन इतना बड़ा नेता बना सकता हूं कि एक नहीं बल्कि आईएएस अधिकारियों की पूरी कतार आपके आदेशों का पालन करने के लिए लाइन में खड़ी होगी। बस यही से उनका राजनीतिक सफर शुरू हो गया।
मायावती को लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें बहनजी कहकर बुलाते हैं। उनकी सार्वजनिक सभाओं में बड़ी संख्या में दर्शक शामिल होते हैं, जो ‘कांशीराम का मिशन अधूरा, बहन मायावती करेंगी पूरा’ और ‘बहनजी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं’ जैसे नारे लगाते हैं।
राजनीतिक विश्लेष्कों के अनुसार, मायावती बीते कई साल से जमीनी सियासत नहीं कर रही हैं। वह फील्ड में नहीं जाती हैं और न ही कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने के लिए गांव-गांव दौरे ही करती हैं। वह चहारदीवारी में बैठकर राजनीति कर रहीं हैं। इसके अलावा, कांशीराम के दौर में जिन लोगों ने पार्टी को खड़ा किया था, उन्हें मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। इनमें रामसमुझ पासी और आरके चौधरी जैसे बड़े नेता थे। एक-एक करके इन नेताओं को किसी वजह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पार्टी में जिन्होंने जमीन पर काम किया। वो धीरे-धीरे दूर होते चले गए।

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