मिडिल ईस्ट में जंग से बढ़ा तेल संकट, भारत-चीन की अर्थव्यवस्था पर मंडराया खतरा
संवाददाता
5 March 2026
अपडेटेड: 4:58 PM 0thGMT+0530
5 मार्च 2026
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के हालात ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है। युद्ध की आशंका और तेल आपूर्ति पर खतरे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इससे भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
दरअसल, मिडिल ईस्ट दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यहां स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल टैंकर इसी रास्ते से गुजरते हैं। यदि युद्ध के कारण इस मार्ग में बाधा आती है तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
युद्ध की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर दुनिया भर में ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, जिससे परिवहन लागत बढ़ेगी और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ेगा। इससे महंगाई बढ़ने और अर्थव्यवस्था पर दबाव आने की आशंका है।
चीन के लिए भी यह संकट कम गंभीर नहीं है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी औद्योगिक अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर करती है। यदि मिडिल ईस्ट से तेल आपूर्ति बाधित होती है तो चीन के उद्योगों और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिडिल ईस्ट में संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शेयर बाजार, व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि यह तनाव आगे किस दिशा में जाता है l