राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बड़ा बयान…

khabar pradhan

संवाददाता

15 May 2025

अपडेटेड: 12:19 PM 0thGMT+0530

राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बड़ा बयान…

राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बड़ा बयान...

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर सवाल उठाते हुए संविधान की व्याख्या और राष्ट्रपति-राज्यपाल की भूमिका को लेकर 14 अहम सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए किसी बिल पर फैसला लेने की कोई तय समयसीमा नहीं है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट उस पर समयसीमा तय कैसे कर सकता है.
यह पूरा विवाद तमिलनाडु राज्य से जुड़ा है, जहां राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित बिलों को मंजूरी देने में देरी की गई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को फैसला देते हुए कहा था कि राज्यपाल के पास बिलों को रोकने की कोई असीमित शक्ति नहीं है और उन्हें तीन महीने के भीतर राष्ट्रपति के पास भेजे गए बिलों पर निर्णय लेना होगा. राष्ट्रपति मुर्मू ने इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेदों और न्यायिक सीमाओं को लेकर सवाल उठाए हैं.

संविधान में समयसीमा तय नहीं, तो अदालत कैसे तय कर सकती है?
राष्ट्रपति मुर्मू ने यह मूल प्रश्न उठाया है कि जब संविधान में स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए किसी बिल पर फैसला लेने की कोई समयसीमा तय नहीं है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट उस पर निर्णय सुना सकता है? उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या इस तरह का निर्देश संविधान के अनुच्छेद 361, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को न्यायिक प्रक्रिया से छूट देता है, का उल्लंघन नहीं होगा.
इसके अलावा, उन्होंने जानना चाहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसलों को पलट सकता है. यह एक संवेदनशील प्रश्न है, क्योंकि अनुच्छेद 142 का प्रयोग न्याय की पूर्णता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है, लेकिन यह भी बहस का विषय है कि क्या इसका उपयोग कार्यपालिका के संवैधानिक कार्यों में हस्तक्षेप के लिए किया जा सकता है.

क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसलों पर अदालत की सुनवाई संभव है?
राष्ट्रपति मुर्मू ने न्यायपालिका और कार्यपालिका की सीमाओं को स्पष्ट करने की मांग की है. उनके अनुसार, यदि राष्ट्रपति और राज्यपाल संविधान के अनुसार निर्णय लेते हैं, तो उनके फैसलों पर अदालत पहले से कैसे सुनवाई कर सकती है, खासकर जब वे अभी प्रभाव में नहीं आए हों.
उन्होंने यह भी पूछा कि क्या राज्यपाल के फैसले मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होते हैं और क्या राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक होती है या वे अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं. यह प्रश्न भारत की संघीय संरचना और राज्यपाल की भूमिका को लेकर समय-समय पर उठते रहे हैं, विशेषकर जब राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच राजनीतिक मतभेद हों.

क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश संविधान से ऊपर हो सकते हैं?
राष्ट्रपति ने यह भी पूछा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या वर्तमान कानूनों के अनुरूप न हो? यह प्रश्न भारत की न्यायिक सक्रियता (judicial activism) को लेकर एक महत्वपूर्ण विमर्श को जन्म देता है. न्यायपालिका का कार्य संविधान की व्याख्या करना है, न कि नए कानून बनाना, ऐसा कई संवैधानिक विद्वान मानते हैं.
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति ने यह भी जानना चाहा है कि क्या केंद्र और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवादों का समाधान केवल सुप्रीम कोर्ट कर सकता है या अन्य संस्थागत विकल्प भी मौजूद हैं.

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