शराबबंदी पर नीतीश की जिद
संवाददाता
26 April 2025
अपडेटेड: 6:53 AM 0thGMT+0530
शराबबंदी पर नीतीश की जिद
विपक्ष-एनडीए सहयोगियों की नाराजगी के बावजूद 5 बड़े कारणों से अडिग
बिहार में शराबबंदी को लेकर सियासी घमासान चरम पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार द्वारा लागू शराबबंदी कानून को लेकर न केवल विपक्ष, बल्कि एनडीए के सहयोगी दल भी खुलकर नाराजगी जता रहे हैं। इसके बावजूद नीतीश कुमार इस नीति पर अडिग हैं और इसे वापस लेने के मूड में नहीं दिख रहे। आखिर क्या हैं वे पांच बड़े फैक्टर जो नीतीश को इस विवादास्पद फैसले पर डटे रहने की ताकत दे रहे हैं? आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।
- सामाजिक सुधार का वादा: नीतीश कुमार ने 2016 में शराबबंदी लागू करते समय इसे सामाजिक सुधार का सबसे बड़ा कदम बताया था। खासकर महिलाओं और ग्रामीण समाज के लिए यह नीति उनकी सरकार की पहचान बन गई। नीतीश का मानना है कि शराबबंदी से परिवारों में घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और सामाजिक बुराइयां कम हुई हैं। उनकी यह छवि ‘सुशासन बाबू’ के रूप में और मजबूत होती है, जो उनके लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। बिहार में महिलाएं, जो उनकी वोटर बेस का बड़ा हिस्सा हैं, इस नीति को समर्थन देती रही हैं। नीतीश इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हैं और इसे वापस लेना उनकी विश्वसनीयता को ठेस पहुंचा सकता है।
- विपक्ष को जवाब देने की रणनीति: विपक्ष, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस, शराबबंदी को लागू करने में हुई खामियों और अवैध शराब तस्करी को लेकर नीतीश पर हमलावर है। हालांकि, नीतीश इसे विपक्ष की साजिश के रूप में पेश करते हैं। उनका तर्क है कि शराबबंदी की नीति सही है, लेकिन कुछ लोग इसे बदनाम करने के लिए तस्करी को बढ़ावा दे रहे हैं। नीतीश इस मुद्दे पर पीछे हटकर विपक्ष को यह मौका नहीं देना चाहते कि वे उनकी सरकार को कमजोर और हार मानने वाली साबित करें।
- एनडीए के दबाव को नजरअंदाज करना: एनडीए के सहयोगी, जैसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM), ने शराबबंदी की समीक्षा की मांग की है। BJP के कुछ नेता इसे आर्थिक नुकसान और अवैध कारोबार का कारण मानते हैं। फिर भी, नीतीश इस दबाव को नजरअंदाज कर रहे हैं। उनकी स्थिति गठबंधन में मजबूत है, क्योंकि JDU बिहार में एनडीए का प्रमुख चेहरा है। नीतीश जानते हैं कि BJP फिलहाल उनके बिना बिहार में सरकार नहीं चला सकती, जिससे वे अपनी बात मनवाने में सक्षम हैं।
- अवैध शराब के कारोबार पर कार्रवाई: बिहार में शराबबंदी के बाद अवैध शराब की तस्करी और जहरीली शराब से होने वाली मौतों ने सुर्खियां बटोरी हैं। नीतीश इसे कानून-व्यवस्था की चुनौती मानते हैं और इसके लिए पुलिस व प्रशासन को और सख्ती करने के निर्देश दे रहे हैं। उनकी सरकार ने हाल ही में तस्करी रोकने के लिए कई बड़े ऑपरेशन शुरू किए हैं, जिसमें सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए। नीतीश का मानना है कि शराबबंदी को कमजोर करने की बजाय, इसे और प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है।
- राजनीतिक विरासत का सवाल: नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी केवल एक नीति नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत का हिस्सा है। पिछले दो दशकों में उन्होंने बिहार को ‘जंगलराज’ से निकालकर विकास और सुशासन की राह पर लाने का दावा किया है। शराबबंदी को वापस लेना उनके इस नैरेटिव को कमजोर कर सकता है। नीतीश 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी छवि को और मजबूत करना चाहते हैं, ताकि JDU को मजबूत स्थिति में लाया जा सके