सोशल मीडिया पर मानहानि या दुर्भावना पूर्ण अभियान अभिव्यक्ति की आजादी नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ अपमान नहीं हो सकता: हाईकोर्ट
संवाददाता
2 February 2026
अपडेटेड: 6:50 PM 0ndGMT+0530
अभिव्यक्ति की आजादी पर दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा -संतुलन जरूरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब किसी का अपमान करना नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता का उपयोग जिम्मेदारी और मर्यादा के साथ किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि मान-सम्मान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस ज्योति सिंह ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दूसरों के अधिकारों को कुचलना के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। खासकर ऐसे संस्थान को जो प्रतिष्ठा के अधिकार रखता हो और जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग माना जाने वाला हो।
उन्होंने कहा कि बोलने की आजादी महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है। लेकिन आजादी की आड़ में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मान सम्मान की हानि,अपमानजनक या दुर्भावना पूर्ण किसी भी ऐसी सामग्री को प्रकाशित करने का अधिकार नहीं देता।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि बोलने की आजादी का अधिकार प्रतिष्ठा और गरिमा में के साथ-साथ संतुलित व्यवस्था का एक आंतरिक हिस्सा है।
बोलने की आजादी का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए यह एक लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है। मर्यादा पूर्ण और संयमित भाषा का इस्तेमाल कर मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। इसे एक पूर्ण ,असीमित, अनियंत्रित बेलगाम अधिकार नहीं होना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि ऑनलाइन माध्यमों पर अभिव्यक्ति के नाम पर आपत्तिजनक या अपमानजनक सामग्री साझा करना स्वीकार्य नहीं है। स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि किसी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।
भ्रामक या अपमानजनक बयानों के माध्यम से किसी दूसरे पक्ष का अपमान करना गैर कानूनी है और कानून में इसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने मामले में यह संदेश दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विचार व्यक्त करते समय कानून और सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखना अनिवार्य है।