10 साल में 10 हजार से ज्यादा माओवादियों ने छोड़ा हिंसा का रास्ता
संवाददाता
30 March 2026
अपडेटेड: 2:26 PM 0thGMT+0530
30 मार्च 2026
नई दिल्ली:
भारत में नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में है। पिछले 10 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और सरकार की बेहतर पुनर्वास नीतियों की वजह से 10,000 से ज्यादा माओवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। केंद्र सरकार ने 31 मार्च तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है, और नतीजे सकारात्मक दिख रहे हैं। अकेले साल 2025 में 2,300 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, वहीं 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 630 से ज्यादा लोग हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं।
सुरक्षा और विकास ने बदली तस्वीर
नक्सल प्रभावित इलाकों (लाल गलियारे) में सरकार ने अपनी पुरानी नीतियों को बदलकर एक नई और एकजुट रणनीति अपनाई है। साल 2014 में जहां केवल 66 मजबूत पुलिस स्टेशन थे, उनकी संख्या अब बढ़कर 586 हो गई है। पिछले 6 सालों में 361 नए सुरक्षा कैंप बनाए गए हैं और ऑपरेशन को ताकत देने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड भी तैयार किए गए हैं। इसका सीधा असर यह हुआ कि नक्सली घटनाओं वाले थानों की संख्या 330 से घटकर मात्र 52 रह गई है। इसके साथ ही, सीमा सड़क संगठन (BRO) ने इन दुर्गम इलाकों में करीब 15,000 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई हैं, जिससे सुरक्षा बलों और आम लोगों की पहुंच आसान हुई है।
जमीन पर दिख रहा है योजनाओं का असर
हिंसा कम होने का सबसे बड़ा फायदा वहां के आम निवासियों को मिल रहा है। सरकार की कल्याणकारी योजनाएं अब सीधे उन तक पहुंच रही हैं। पीएम-आवास योजना के तहत घरों की संख्या 92 हजार से बढ़कर 2.54 लाख से भी ज्यादा हो गई है। शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है; 250 स्वीकृत एकलव्य स्कूलों में से 179 शुरू हो चुके हैं, और 11 केंद्रीय व 6 नवोदय विद्यालय भी संचालित हैं। युवाओं को हुनरमंद बनाने और रोजगार देने के लिए 48 जिलों में आईटीआई (ITI) और कौशल विकास केंद्र खोले गए हैं।
शहरी नक्सलवाद पर भी नकेल
सिर्फ जंगलों में ही नहीं, बल्कि शहरों में बैठे ‘अर्बन नक्सलियों’ और फंडिंग करने वालों पर भी सरकार ने शिकंजा कसा है। एनआईए (NIA) और ईडी (ED) ने करोड़ों की संपत्ति जब्त की है, जिससे नक्सलियों का सूचना तंत्र और आर्थिक कमर टूट गई है। जो लोग आत्मसमर्पण कर रहे हैं, सरकार उन्हें नई पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक मदद, ट्रेनिंग और घर भी दे रही है, ताकि वे एक सम्मानजनक जीवन जी सकें।