20 मार्च -गौरैया दिवस: लौटती चहचहाहट और हमारी जिम्मेदारी

khabar pradhan

संवाददाता

20 March 2026

अपडेटेड: 3:42 PM 0thGMT+0530

20 मार्च -गौरैया दिवस: लौटती चहचहाहट और हमारी जिम्मेदारी

20 मार्च 2026

कभी हर घर-आंगन की पहचान रही गौरैया, बीते दशकों में तेजी से कम होती चली गई। लेकिन अब जागरूकता और लोगों की छोटी-छोटी पहल से इसकी चहचहाहट फिर से सुनाई देने लगी है। इसी संदेश को आगे बढ़ाने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

गौरैया केवल एक नन्हा पक्षी नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण की स्थिति का संकेतक भी है। यह इकोसिस्टम की महत्वपूर्ण कड़ी है, जो प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। पासेरिडी परिवार की यह छोटी चिड़िया हजारों वर्षों से मनुष्यों के साथ रह रही है और भारत में इसे शुभ माना जाता है।

हालांकि 1970 के बाद से कई देशों में गौरैया की संख्या में 50 से 70 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें बढ़ता प्रदूषण, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण, कीटनाशकों का अधिक उपयोग और तेजी से बदलता शहरी ढांचा प्रमुख हैं lमोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडिएशन,कंक्रीट के घर, जिनमें घोंसला बनाने की जगह नहीं,कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग
बढ़ता प्रदूषण और शोर इन सब कारणों से गौरैया के लिए जीना मुश्किल होता जा रहा है।

हालांकि राहत की बात यह है कि अब लोग इस दिशा में जागरूक हो रहे हैं। घरों में पानी और दाना रखना, छोटे-छोटे घोंसले लगाना और हरियाली बढ़ाना जैसी पहलें गौरैया की वापसी में मदद कर रही हैं।

आईयूसीएन की रेड लिस्ट में गौरैया को अभी “लीस्ट कन्सर्न” श्रेणी में रखा गया है, लेकिन इसकी घटती संख्या भविष्य के लिए चेतावनी जरूर है।

आज जरूरत है कि हम सब मिलकर इस नन्हे पक्षी के संरक्षण का संकल्प लें। क्योंकि अगर गौरैया बचेगी, तो हमारा पर्यावरण भी संतुलित और जीवंत बना रहेगा।

गौरैया क्यों है खास?

गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और प्रकृति का हिस्सा है।
सुबह की चहचहाहट से घरों में जीवन भर देती है
खेतों में कीड़े खाकर फसलों की रक्षा करती है
पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करती है
भारत में इसे प्यार से “चिड़िया” कहा जाता है, और यह कई लोकगीतों, कहानियों और बचपन की यादों में बसी हुई है।

हम इसे कैसे बचा सकते हैं?

छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं:
पानी और दाना रखें: गर्मियों में छत या बालकनी में पानी और अनाज रखें
घोंसले बनाएं: लकड़ी या मिट्टी के छोटे घर (Nest Box) लगाएं
पेड़-पौधे लगाएं: प्राकृतिक वातावरण बनाए रखें
केमिकल कम करें: कीटनाशकों का कम उपयोग करें

भोपाल जैसे शहरों की पहल

आज कई शहरों में लोगों ने गौरैया को वापस लाने के लिए पहल शुरू की है।
घरों में फीडर और वाटर पॉट लगाए जा रहे हैं
बच्चों को गौरैया संरक्षण के बारे में जागरूक किया जा रहा है
स्कूलों और समाज में “Save Sparrow Campaign” चलाए जा रहे हैं

एक छोटी कोशिश, बड़ा असर

गौरैया को बचाना सिर्फ पर्यावरण की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उपहार है।

अगर हर घर एक कटोरी पानी और थोड़ा सा दाना रख दे, तो शायद फिर से हमारी सुबहें गौरैया की चहचहाहट से गूंज उठेंगी।

इस गौरैया दिवस पर संकल्प लें:
“हम अपने घर और शहर को फिर से गौरैया के लिए सुरक्षित बनाएंगे।”

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