सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति: 31 वर्षीय हरीश राणा के मामले ने झकझोरा

khabar pradhan

संवाददाता

12 March 2026

अपडेटेड: 4:20 PM 0thGMT+0530

सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति: 31 वर्षीय हरीश राणा के मामले ने झकझोरा

12 मार्च 2026

नई दिल्ली। संतान के लिए माता-पिता हमेशा लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करते हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थितियाँ इतनी कठिन हो जाती हैं कि वही माता-पिता अपने बच्चे की पीड़ा समाप्त करने के लिए मृत्यु की अनुमति मांगने को मजबूर हो जाते हैं।

ऐसा ही एक संवेदनशील मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, जिसमें अदालत ने 31 वर्षीय हरीश राणा को इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति दे दी। अदालत का यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि लंबे समय से पीड़ा झेल रहे परिवार के लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन अध्याय का अंत भी माना जा रहा है।

बताया जा रहा है कि हरीश राणा लंबे समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे थे। उनके माता-पिता वर्षों से उन्हें इस हालत में देख रहे थे। उनकी स्थिति ऐसी हो गई थी कि वे केवल सांस लेते हुए दिखाई देते थे, लेकिन सामान्य जीवन जीने की स्थिति में नहीं थे।

दुर्घटना के बाद 12 साल से कोमा में थे हरीश राणा

दिल्ली के रहने वाले हरीश राणा की जिंदगी एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह बदल गई। वर्ष 2013 में हास्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनके सिर में गंभीर चोट आई और पूरा शरीर लकवा ग्रस्त हो गया ।

हादसे के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उनकी जान तो बचा ली, लेकिन उनके दिमाग को गहरी चोट पहुंची, जिससे वे ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में चले गए। इस स्थिति में उनका शरीर सांस लेता रहता था, लेकिन चेतना लगभग समाप्त हो चुकी थी।

करीब 12 वर्षों तक हरीश राणा इसी हालत में रहे। इस दौरान उनके माता-पिता लगातार उनकी देखभाल करते रहे, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

लंबे समय से बेटे को इस हालत में देखते हुए परिवार ने अदालत से इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति मांगी। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।

अदालत का यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि उस परिवार की वर्षों से चली आ रही पीड़ा का अंत भी माना जा रहा है।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दी। यह फैसला उस परिवार की पीड़ा को समझते हुए लिया गया, जिसने अपने बेटे को लंबे समय तक इस हालत में देखा।

इतिहास में पहली पहली बार ऐसा फैसला देते हुए इच्छा मृत्यु दी है l परिवार मीडिया के सामने आने से बच रहा था, लेकिन अब पिता ने हिम्मत जुटा कर  मीडिया से बात की l बेटे की हालत और पैसिव यूथनेशिया पर कोर्ट के फैसले पर  वे भावुक हो गए, उन्होंने रोते हुए कहा कि एक पिता के नाते मेरे लिए यह बहुत मुश्किल है, परंतु खुशी की बात है कि बाकी लोग जो इस अवस्था में है उन्हें भी इस फैसले से राहत मिलेगी l

यह मामला केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि गंभीर और असाध्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए गरिमापूर्ण जीवन और मृत्यु के अधिकार को किस तरह देखा जाना चाहिए।

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