2 June 2026: खबर प्रधान डेस्क:
वक्फ संस्थानों को मुकदमों की सुनवाई के दौरान कोर्ट फीस से छूट मिलनी चाहिए या नहीं, इस गंभीर मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने कड़े सवाल उठाए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि आखिर किस कानून या नियम के तहत वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस के भुगतान से विशेष छूट का अधिकार मिल सकता है.
यह पूरा मामला गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिका से जुड़ा हुआ है. गुजरात हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में साफ कहा था कि वक्फ ट्रिब्यूनल में दाखिल होने वाले मामलों के लिए कोर्ट फीस का भुगतान करना अनिवार्य है और वक्फ संस्थानों को इससे कोई विशेष छूट नहीं दी गई है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से देश के वरिष्ठ अधिवक्ता (वकील) एजाज मकबूल पेश हुए. उन्होंने दिसंबर 2025 में आए गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के समर्थन में कुछ अतिरिक्त दस्तावेज अदालत के सामने पेश करने के लिए थोड़ा समय मांगा.
इस अनुरोध पर पीठ के माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने स्पष्ट सवाल किया कि कोर्ट फीस से छूट का दावा आखिर किस कानूनी आधार पर किया जा रहा है? ऐसा कौन सा कानून मौजूद है जो वक्फ संस्थानों को यह बड़ी राहत देता है? सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लगातार आ रहे इन सवालों पर वक्फ के वकील एजाज मकबूल ने कहा कि वह अगली सुनवाई के दौरान इस पूरे विषय पर अपनी विस्तृत दलीलें अदालत के सामने पेश करेंगे. इसके साथ ही उन्होंने मामले को 7 अगस्त तक टालने का अनुरोध किया.
जानिए गुजरात उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) ने अपने फैसले में क्या कहा था?
इस विवाद की शुरुआत गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले से हुई थी जो 17 दिसंबर 2025 को आया था. तब हाई कोर्ट ने वक्फ संस्थानों की कई याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने वक्फ ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को बिल्कुल सही माना था, जिनमें पर्याप्त कोर्ट फीस जमा न करने के कारण मामलों की कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया था.
गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले को स्पष्ट करते हुए दो मुख्य बातें कही थीं:
वक्फ एक्ट के सेक्शन 83 के तहत ट्रिब्यूनल में दायर होने वाले मामलों के लिए वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस से किसी भी तरह की सामान्य या पूर्ण छूट नहीं दी गई है.
अदालत ने याचिकाकर्ताओं के उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें उनका कहना था कि धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल में कार्यवाही केवल एक आवेदन (एप्लीकेशन) के माध्यम से शुरू होती है न कि किसी औपचारिक ‘वाद’ (सूट) के रूप में, इसलिए इस पर भारी कोर्ट फीस नहीं लगनी चाहिए.


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