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12 June 2026

सुप्रीम कोर्ट ने घर संभालने वाली महिलाओं के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि घर की देखभाल करने वाली महिलाओं को सिर्फ हाउसमेकर न समझा जाए, बल्कि वे असल में राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) हैं.
शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि अगर किसी सड़क दुर्घटना में किसी गृहिणी की मौत हो जाती है, तो मुआवजा तय करते समय उनकी आय शून्य नहीं मानी जाएगी. उनके द्वारा घर और परिवार की देखभाल में किए जाने वाले कामकाज की कीमत कम से कम 30 हजार रुपये मासिक मानी जाएगी और इसी आधार पर उनके परिवार को मिलने वाले मुआवजे की गणना की जाएगी.

कामकाजी महिलाओं की तरह अलग से जुड़ेगा नुकसान का हिस्सा
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मोटर वाहन दुर्घटना से जुड़े वर्षों से लंबित मामलों पर गहरी चिंता जताई और इसके त्वरित निपटारे के लिए नए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं.
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि जिन मामलों में गृहिणी कोई नौकरी या पेशा भी करती हैं, वहां उनके कामकाज यानी नौकरी से होने वाले नुकसान का हिस्सा इस 30 हजार रुपये की मासिक आय से अलग और अतिरिक्त जोड़ा जाएगा. यानी नौकरी की सैलरी के साथ-साथ उनके घरेलू योगदान को भी मुआवजे का हिस्सा बनाया जाएगा.

देश की जीडीपी में गृहिणियों का बिना पैसे वाला योगदान 15 से 17 प्रतिशत
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि समाज और देश के विकास में अमूल्य योगदान देने वाली महिलाओं को हमेशा अनदेखा किया जाता है. कोर्ट ने कहा कि यह एक बड़ी विडंबना है कि घर संभालने वाली महिला को कमाने वाले सदस्यों पर पूरी तरह निर्भर मान लिया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि घर का पूरा कामकाज काफी हद तक उसी महिला पर निर्भर करता है.
पीठ ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं के बिना पैसे वाले देखभाल के काम का भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में करीब 15 से 17 प्रतिशत का योगदान माना जाता है, फिर भी समाज में उन्हें न तो इसके बदले पैसे मिलते हैं और न ही कोई पहचान मिलती है.

हर तीन साल में बढ़ेगा 10 प्रतिशत मुआवजा
अदालत ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की राशि में बढ़ोतरी का भी प्रावधान किया है. कोर्ट के निर्देश के अनुसार, मोटर दुर्घटना के मामलों पर विचार करते समय, अगर तीन मुख्य बातें जैसे- मृतक पर बच्चों या मां की निर्भरता, बच्चों को मां का या पति को जीवनसाथी का सहारा न मिलना और वित्तीय सहायता का नुकसान होना साबित हो जाती हैं, तो गृहिणी की इस तय की गई 30 हजार रुपये मासिक आय में हर तीन साल में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी. यह नियम उन सभी मामलों में लागू होगा जहां गृहिणियों का घर में कोई सीधा मौद्रिक योगदान नहीं होता था.

क्या है पूरा मामला?
यह ऐतिहासिक फैसला पंजाब में हुए एक सड़क हादसे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया है. साल 2001 में एक सड़क दुर्घटना में एक महिला की मौत हो गई थी, जो कि महिला उद्यमी भी थीं और साथ ही बेहतरीन तरीके से अपना घर भी संभालती थीं. ट्रिब्यूनल कोर्ट ने इस मामले में पहले 2.52 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश दिया था. इसके बाद उच्च न्यायालय ने इस राशि को थोड़ा बढ़ाकर 4.45 लाख रुपये कर दिया था और परिवार को 9 प्रतिशत ब्याज के साथ यह राशि देने को कहा था.
पीड़ित परिवार इस फैसले से संतुष्ट नहीं था और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाते हुए और महिला के दोनों रूपों (कामकाजी और गृहिणी) के योगदान को स्वीकार करते हुए मुआवजे की रकम को कई गुना बढ़ाकर कुल 62,77,360 रुपये करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट का यह दूरगामी फैसला देश की करोड़ों महिलाओं के श्रम और उनके सम्मान को एक नई पहचान देने वाला साबित होगा.


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