नवरात्रि का नौवां दिन: माता सिद्धिदात्री की कथा
संवाददाता
5 April 2025
अपडेटेड: 7:29 AM 0thGMT+0530
नवरात्रि का नौवां दिन: माता सिद्धिदात्री की कथा, पूजा विधि, और महत्व l
पूजा विधि, और महत्व l
नवरात्रि के नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। माता सिद्धिदात्री पूर्णता, सिद्धि और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक हैं। ‘सिद्धिदात्री’ का अर्थ है – वह देवी जो अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। यह दिन शक्ति साधना और आत्मिक उन्नति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। उनकी उपासना से साधक को न केवल सांसारिक सफलता प्राप्त होती है, बल्कि उसे आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग भी मिलता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि की रचना हुई, तब भगवान शिव ने माता सिद्धिदात्री की उपासना की और उनकी कृपा से अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त कीं। माता की कृपा से ही भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए, जिसमें आधा भाग शिव का और आधा भाग शक्ति का था। एक अन्य कथा के अनुसार, माता सिद्धिदात्री ने देवताओं, ऋषियों और योगियों को सिद्धियाँ प्रदान कीं, जिससे वे आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सके।
माता सिद्धिदात्री की पूजा विधि अत्यंत सरल और प्रभावशाली होती है। इस दिन भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और माता की आराधना का संकल्प लेते हैं। घर के पवित्र स्थान पर माता सिद्धिदात्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर गंगा जल, पुष्प, अक्षत, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। माता को सफेद रंग की मिठाई, नारियल और कमल का फूल अर्पित किया जाता है, क्योंकि सफेद रंग शुद्धता और ज्ञान का प्रतीक होता है। माता का ध्यान करते हुए “ॐ सिद्धिदात्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से कन्या पूजन का महत्व होता है, जिसमें नौ कन्याओं को भोजन कराकर उन्हें देवी स्वरूप मानकर सम्मान दिया जाता है।
माता सिद्धिदात्री की उपासना से व्यक्ति को आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों ही लाभ प्राप्त होते हैं। माता की कृपा से भक्त की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है। यह दिन साधना और ध्यान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि माता की उपासना से साधक का मन एकाग्र होता है और उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। माता की कृपा से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं और व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही, इनकी आराधना से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
माता सिद्धिदात्री का संबंध हमारे शरीर के सहस्रार चक्र से होता है, जो सिर के शीर्ष पर स्थित होता है। यह चक्र ब्रह्मांडीय ऊर्जा और आत्मज्ञान का द्वार है। जब सहस्रार चक्र सक्रिय होता है, तो व्यक्ति को परम शांति और ईश्वरीय चेतना की अनुभूति होती है। माता सिद्धिदात्री की उपासना से सहस्रार चक्र जाग्रत होता है, जिससे व्यक्ति ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ता है। इस चक्र के संतुलित होने पर व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और वह आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छूता है। सहस्रार चक्र का जागरण व्यक्ति के ज्ञान, बुद्धि और ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है, जिससे वह अपने जीवन में उन्नति करता है।
नवरात्रि का नौवां दिन माता सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का एक उत्तम अवसर होता है। इस दिन माता की सच्चे मन से आराधना करने से जीवन में सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। माता की पूजा से सहस्रार चक्र जाग्रत होता है, जिससे व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अनुभूति होती है। जो साधक इस दिन विशेष रूप से माता की साधना करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। माता सिद्धिदात्री की कृपा से जीवन में शांति, समृद्धि और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति न केवल अपने सांसारिक जीवन में सफलता प्राप्त करता है, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर भी उन्नति करता है l