सुप्रीम कोर्ट बनाम राष्ट्रपति: धनखड़ बोले- अदालत राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकती

khabar pradhan

संवाददाता

17 April 2025

अपडेटेड: 11:26 AM 0thGMT+0530

अनुच्छेद 142 ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बना

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत राष्ट्रपति को कोई आदेश नहीं दे सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के उपयोग को ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ की संज्ञा दी, जिसके दुरुपयोग से संवैधानिक संस्थानों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। यह विवाद तब शुरू हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को निर्देश दिया था कि वह तीन महीने के भीतर संसद द्वारा पारित विधेयकों पर फैसला करें। इस मामले ने संवैधानिक शक्तियों और संस्थागत सीमाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक याचिका की सुनवाई के दौरान राष्ट्रपति को विधेयकों पर समयबद्ध तरीके से फैसला लेने का निर्देश दिया था। कोर्ट का यह आदेश अनुच्छेद 142 के तहत आया, जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए असाधारण शक्तियां प्रदान करता है। इस आदेश में कहा गया था कि राष्ट्रपति को संसद द्वारा पारित विधेयकों पर तीन महीने के भीतर अपनी सहमति, असहमति या अन्य निर्णय स्पष्ट करना होगा। यह फैसला कुछ विधेयकों के लंबित होने और उन पर राष्ट्रपति की ओर से देरी की शिकायतों के बाद आया था।
हालांकि, इस आदेश ने संवैधानिक हलकों में विवाद खड़ा कर दिया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति के संवैधानिक विशेषाधिकारों में हस्तक्षेप करता है, क्योंकि संविधान राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं करता।
धनखड़ का बयान
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है, और अदालत को उनके कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। धनखड़ ने अनुच्छेद 142 की तुलना ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ से करते हुए चेतावनी दी कि इसका अंधाधुंध उपयोग संवैधानिक संस्थानों के बीच टकराव को जन्म दे सकता है।
उन्होंने कहा, “अनुच्छेद 142 को पूर्ण न्याय के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल अब एक हथियार की तरह हो रहा है। यह संवैधानिक ढांचे के लिए खतरनाक है। राष्ट्रपति को कोई समयसीमा देना उनके संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण है।” धनखड़ ने यह भी कहा कि संवैधानिक संस्थानों को एक-दूसरे की स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।


सुप्रीम कोर्ट का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में तर्क दिया था कि विधेयकों पर अनिश्चितकालीन देरी संसद की संप्रभुता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है। कोर्ट का कहना था कि राष्ट्रपति का यह दायित्व है कि वह संसद द्वारा पारित विधेयकों पर उचित समय में निर्णय लें। अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट ने इस आदेश को ‘न्याय के हित’ में जरूरी बताया था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विधायी प्रक्रिया में अनावश्यक रुकावटें न आएं। हालांकि, कोर्ट के इस कदम को कुछ विशेषज्ञों ने ‘अति-न्यायिक सक्रियता’ करार दिया है।
संवैधानिक विशेषज्ञों की राय
इस विवाद ने संवैधानिक विशेषज्ञों को दो खेमों में बांट दिया है। एक पक्ष का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। उनका तर्क है कि विधेयकों पर अनिश्चितकालीन देरी से संसद का महत्व कम होता है, और कोर्ट का हस्तक्षेप इस स्थिति को सुधारने के लिए जरूरी था।
दूसरी ओर, कई विशेषज्ञ धनखड़ के विचारों से सहमत हैं और इसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से अपनी शक्तियों का अतिरेक मानते हैं। उनका कहना है कि संविधान में राष्ट्रपति को विधेयकों पर विचार करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है, और कोई भी समयसीमा निर्धारित करना उनके संवैधानिक विशेषाधिकारों का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 142 का विवाद
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को असाधारण शक्तियां देता है ताकि वह पूर्ण न्याय सुनिश्चित कर सके। हालांकि, इस अनुच्छेद का उपयोग अक्सर विवादों को जन्म देता है। पहले भी कई मामलों में कोर्ट के इस अनुच्छेद के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं, जैसे कि कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द करना और पुलिस सुधारों के लिए दिशानिर्देश जारी करना। धनखड़ का ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ वाला बयान इस अनुच्छेद के दुरुपयोग की आशंकाओं को और बल देता है।
आगे की राह
यह मामला अब संवैधानिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और धनखड़ के बयान ने संवैधानिक संस्थानों के बीच शक्ति संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का समाधान तभी संभव है, जब सभी संस्थाएं अपनी संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करें।
कुछ जानकारों का सुझाव है कि इस तरह के टकराव से बचने के लिए संविधान में स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए, खासकर विधेयकों पर राष्ट्रपति के निर्णय की समयसीमा को लेकर। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा मानते हैं, जहां संस्थाएं एक-दूसरे की शक्तियों की जांच करती हैं।
निष्कर्ष
उपराष्ट्रपति धनखड़ का बयान और सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक बार फिर संवैधानिक शक्तियों और उनकी सीमाओं पर बहस को सामने लाया है। यह विवाद न केवल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भविष्य में इस तरह के मामलों को कैसे संभाला जाएगा। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश पर पुनर्विचार करेगा या यह मामला और गहराएगा।

टिप्पणियां (0)