पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों पर बढ़ता अत्याचार
संवाददाता
21 April 2025
अपडेटेड: 11:51 AM 0stGMT+0530
पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों पर बढ़ता अत्याचार
जमीन खरीदने पर भी पाबंदी, जुल्म की हदें पार
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के खिलाफ दशकों से जारी उत्पीड़न और भेदभाव की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। हाल ही में सामने आई खबरों के अनुसार, अहमदिया मुसलमानों पर अब जमीन खरीदने तक की पाबंदी लगा दी गई है, जो उनके मौलिक अधिकारों पर एक और गंभीर प्रहार है। यह लेख पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों, उनकी कानूनी और सामाजिक स्थिति, और इस मुद्दे पर वैश्विक चिंताओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। यह सामग्री कॉपीराइट-मुक्त है और वेबसाइट पर अपलोड करने के लिए स्वतंत्र रूप से उपयोग की जा सकती है।
अहमदिया समुदाय पर नई पाबंदी
आज तक की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अहमदिया मुसलमानों को जमीन खरीदने से रोकने के लिए स्थानीय प्रशासन और कट्टरपंथी समूहों ने मिलकर पाबंदियां लागू की हैं। यह कदम अहमदिया समुदाय को सामाजिक और आर्थिक रूप से और हाशिए पर धकेलने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसके अलावा, अहमदिया समुदाय के लोगों को अपनी इबादतगाहों को मस्जिद कहने, नमाज पढ़ने, या इस्लामी प्रतीकों का उपयोग करने पर भी कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हाल ही में 23 अहमदिया मुसलमानों को नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया, जो इस समुदाय के खिलाफ बढ़ती असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण है। सोशल मीडिया पर सामने आए पोस्ट्स में यह भी दावा किया गया कि अहमदिया समुदाय की कब्रों को खोदकर अपवित्र किया जा रहा है, और उनके घरों व व्यवसायों पर हमले बढ़ रहे हैं।
अहमदिया समुदाय की कानूनी स्थिति
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय को 1974 के संवैधानिक संशोधन के तहत “गैर-मुस्लिम” घोषित किया गया था। इसके बाद, 1984 में अध्यादेश XX के तहत उनके धार्मिक अधिकारों पर और सख्त प्रतिबंध लगाए गए। इस कानून के तहत:
अहमदिया समुदाय के लोग खुद को मुसलमान नहीं कह सकते।
उनकी इबादतगाहों को मस्जिद कहना या अजान देना गैरकानूनी है।
कुरान पढ़ने या इस्लामी प्रतीकों का उपयोग करने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
इन कानूनों ने अहमदिया समुदाय को न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी कमजोर किया है। उनकी पहचान को “काफिर” के रूप में चिह्नित किया जाता है, जिसके कारण वे रोजमर्रा के जीवन में भेदभाव और हिंसा का शिकार होते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विडंबना
आजादी के समय अहमदिया समुदाय ने पाकिस्तान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके विद्वान और नेता, जैसे सर मुहम्मद जफरुल्लाह खान, ने पाकिस्तान की स्थापना में योगदान दिया। हालांकि, आज वही समुदाय अपने ही देश में कट्टरपंथी हिंसा और सरकारी नीतियों का शिकार है। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने इस विडंबना को उजागर करते हुए लिखा, “पाकिस्तान बनाने में अहमदिया मुसलमानों की बड़ी भूमिका थी, लेकिन आज उन्हें काफिर कहकर उनकी कब्रों तक को अपवित्र किया जा रहा है।”
सामाजिक और धार्मिक उत्पीड़न
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के खिलाफ हिंसा केवल कानूनी प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है। कट्टरपंथी समूहों द्वारा उनकी मस्जिदों, घरों, और व्यवसायों पर हमले आम हो गए हैं। बम विस्फोट, विशेष रूप से अहमदिया और शिया मस्जिदों में, संप्रदायिक उग्रवाद का परिणाम हैं। एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया कि अहमदिया समुदाय के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने में कट्टरपंथी संगठनों की बड़ी भूमिका है।
अहमदिया समुदाय के लोग रोजगार, शिक्षा, और सामाजिक सेवाओं में भी भेदभाव का सामना करते हैं। उनकी नई पीढ़ी को अपनी पहचान छिपाने के लिए मजबूर किया जाता है, और कई परिवार सुरक्षा के लिए देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

वैश्विक चिंता और मानवाधिकार
अहमदिया समुदाय के खिलाफ अत्याचारों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बार-बार चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों, जैसे ह्यूमन राइट्स वॉच, ने पाकिस्तान सरकार से अहमदिया समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने और भेदभावपूर्ण कानूनों को निरस्त करने की मांग की है। हालांकि, इन अपीलों का पाकिस्तान की नीतियों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है।
हाल ही में, अटक की असिस्टेंट कमिश्नर जन्नत हुसैन ने एक कार्यक्रम में अहमदिया सहित अल्पसंख्यकों के लिए एकजुटता का आह्वान किया, लेकिन इस बयान के बाद उन्हें कट्टरपंथी समूहों के गुस्से का सामना करना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि अहमदिया समुदाय के समर्थन में आवाज उठाने वालों को भी दबाव का सामना करना पड़ता है।
भारत में अहमदिया समुदाय
भारत में अहमदिया समुदाय की स्थिति पाकिस्तान की तुलना में कहीं बेहतर है। भारत में उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है, और वे अपनी इबादतगाहें संचालित कर सकते हैं। हालांकि, भारत में भी कुछ क्षेत्रों में सामाजिक तनाव की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई भेदभावपूर्ण कानून नहीं है।