राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने का अर्थ और शंकराचार्य की शक्ति

khabar pradhan

संवाददाता

5 May 2025

अपडेटेड: 8:21 AM 0thGMT+0530

राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने का अर्थ और शंकराचार्य की शक्ति

राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने का अर्थ और शंकराचार्य की शक्ति

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हिंदू धर्म से “बहिष्कृत” करने की घोषणा का मतलब है कि उन्होंने राहुल गांधी को धार्मिक रूप से हिंदू समुदाय से अलग करने का ऐलान किया। यह घोषणा राहुल गांधी के संसद में मनुस्मृति पर दिए गए बयान के जवाब में की गई, जिसे शंकराचार्य ने हिंदू धर्म का अपमान माना। उनके अनुसार, राहुल गांधी ने मनुस्मृति को “अनुचित” बताकर सनातन धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाई। इस “बहिष्करण” का तात्पर्य है कि शंकराचार्य राहुल गांधी को हिंदू धर्म के अनुयायी के रूप में स्वीकार नहीं करते और उन्हें धार्मिक गतिविधियों या समुदाय से अलग मानते हैं।
बहिष्करण का अर्थ
हिंदू धर्म में “बहिष्करण” (या सामाजिक/धार्मिक रूप से अलग करना) ऐतिहासिक रूप से कुछ समुदायों में प्रचलित रहा है, खासकर जब कोई व्यक्ति धर्म के मूल सिद्धांतों या सामाजिक नियमों का उल्लंघन करता है। यह एक प्रतीकात्मक या सामाजिक कदम हो सकता है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति को समुदाय से अलग करना या उसकी धार्मिक वैधता पर सवाल उठाना है। हालांकि, आधुनिक संदर्भ में इसका कोई कानूनी या संवैधानिक आधार नहीं है। यह शंकराचार्य की ओर से एक धार्मिक राय या नैतिक निंदा के रूप में देखा जा सकता है।
शंकराचार्य की शक्ति
शंकराचार्य हिंदू धर्म में अत्यंत सम्मानित धार्मिक नेता हैं, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों (ज्योतिर्मठ, श्रंगेरी, गोवर्धन मठ, और शारदा मठ) के प्रमुख होते हैं। उनकी भूमिका धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने की होती है, और उनके विचार सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच महत्व रखते हैं। हालांकि, उनकी शक्ति कुछ सीमाओं के साथ आती है:
धार्मिक प्रभाव: शंकराचार्य का प्रभाव उनके अनुयायियों और सनातन धर्म के मानने वालों तक सीमित है। उनके बयान या फरमान धार्मिक समुदाय में चर्चा का विषय बन सकते हैं, लेकिन यह सभी हिंदुओं या समाज पर बाध्यकारी नहीं है। हिंदू धर्म में कोई केंद्रीकृत धार्मिक प्राधिकरण नहीं है, जैसा कि कुछ अन्य धर्मों में होता है।
कानूनी शक्ति: भारतीय संविधान के तहत शंकराचार्य या किसी धार्मिक नेता को किसी व्यक्ति को धर्म से “बहिष्कृत” करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। धर्म व्यक्तिगत आस्था का मामला है, और संविधान (अनुच्छेद 25) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। राहुल गांधी या कोई अन्य व्यक्ति स्वयं को हिंदू मानने के लिए स्वतंत्र है, और इस पर कोई धार्मिक नेता कानूनी रूप से रोक नहीं लगा सकता।
सामाजिक प्रभाव: शंकराचार्य के इस बयान का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है, खासकर उन लोगों पर जो उनकी बात को गंभीरता से लेते हैं। यह राहुल गांधी की छवि को प्रभावित करने या राजनीतिक बहस को गर्माने का प्रयास भी हो सकता है। कुछ एक्स पोस्ट्स में इसे “मनुवादी” या “जातिवादी” मानसिकता से जोड़ा गया है, जबकि अन्य इसे धार्मिक भावनाओं की रक्षा के रूप में देखते हैं।
क्या यह बयान प्रभावी है?
धार्मिक दृष्टि से: यह बयान शंकराचार्य के अनुयायियों के बीच राहुल गांधी की धार्मिक विश्वसनीयता पर सवाल उठा सकता है, लेकिन हिंदू धर्म की विविधता और विकेंद्रित प्रकृति के कारण इसका व्यापक प्रभाव सीमित हो सकता है। कई हिंदू संगठन या अन्य धार्मिक नेता इस पर सहमत न हों।
राजनीतिक दृष्टि से: यह बयान कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो सकता है, जैसा कि कुछ एक्स पोस्ट्स में देखा गया।
कानूनी दृष्टि से: इसका कोई प्रभाव नहीं है, क्योंकि धर्म व्यक्तिगत पसंद है, और शंकराचार्य का बयान कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।

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