पाकिस्तान के साथ क्यूं खड़ा है गद्दार तुर्की….भारत के एक्शन से मचा तुर्की में हाहाकार

khabar pradhan

संवाददाता

17 May 2025

अपडेटेड: 1:03 PM 0thGMT+0530

पाकिस्तान के साथ क्यूं खड़ा है गद्दार तुर्की….भारत के एक्शन से मचा तुर्की में हाहाकार

पाकिस्तान के साथ क्यूं खड़ा है गद्दार तुर्की....भारत के एक्शन से मचा तुर्की में हाहाकार

भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो चुका है… इस बीच सभी के मन में ये सवाल जरूर है कि आखिर तुर्कीए क्यूं भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान के साथ खड़ा है..जबकि भारत ने तुर्किए के सबसे बुरे समय में उसका साथ दिया था….भूकंप की तबाही में जब तुर्किए की मदद की थी….बावजूद इसके तुर्किए ने गद्दारी करते हुए दुश्मन का खुलकर साथ दिया …यहां तक कि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने कहा है कि पाकिस्तान के लोग हमारे भाई की तरह हैं और मैं उनके लिए अल्लाह से दुआ करता हूं… तुर्की का ऐसा रुख कभी भारत के लिए नहीं दिखा… कुछ समय से भारत के खिलाफ बयानबाज़ी के चलते सुर्खियों में रहे तुर्की के राष्ट्रपति खुद को मुस्लिम देशों का खलीफा बताने के लिए भी हाल में चर्चित रह चुके हैं. इस पूरे संदर्भ में समझना चाहिए कि भारत और तुर्की दोस्त हैं या दुश्मन? भारत और तुर्की के बीच रिश्तों के इतिहास की चर्चा 1912 से किया जाना ठीक मालूम होता है, जब स्वतंत्रता सेनानी डॉ अंसारी ने बालकन युद्ध के समय तुर्की को मेडिकल मदद भेजी थी….इसके बाद 1920 में तुर्की की आज़ादी की लड़ाई में भी भारत ने मदद की थी. पहले विश्वयुद्ध के बाद महात्मा गांधी ने तुर्की के साथ हुए अन्याय का विरोध किया था….भारत के आज़ाद होने के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तुर्की से संबंध सुधारने के लिए प्रयास किए…. मुस्तफा कमाल पाशा के धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र से प्रबावित हुए औऱ उसी को बारत में लाने का सपना देखा….भारत में सेक्यूलर की नींव तभी पड़ी…इसके बाद दूसरे विश्वयुद्ध के बाद का ही समय था, जब भारत आज़ाद हो रहा था और दुनिया एक सियासी खेमेबाज़ी में तब्दील हो रही थी. अमेरिका और सोवियत संघ दुनिया की दो ताकत बनकर दो छोर बन गए थे और ऐसे में तुर्की अमेरिका के ‘नाटो’ खेमे में शामिल हुआ. और पाकिस्तान भी. लेकिन नेहरू के नेतृत्व में भारत किसी खेमे में नहीं गया… 1947 से ही अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध की शुरूआत हो चुकी थी. भारत तटस्थ रहते हुए भी धीरे धीरे सोवियत संघ वाले गुट की तरफ झुक रहा था. इस दौरान तुर्की तो अमेरिकी खेमे में था ही, और इस तरह से अपनी अपनी विदेश नीतियों से दोनों देश दूर होते चले गए….शीत युद्ध और खेमेबाज़ी का एक असर ये भी हुआ कि तुर्की और पाकिस्तान के बीच दोस्ताना रिश्ते बने. 1965 और 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच दो बार ऐतिहासिक लड़ाई हुई और दोनों ही बार तुर्की ने पाकिस्तान की भरपूर मदद की. सैन्य मदद भी….इधर पाकिस्तान के पक्ष में तुर्की के खुले सहयोग के बाद जब 1974 में तुर्की ने साइप्रस पर हमला किया तो भारत ने साइप्रस का साथ दिया. इसके पीछे बदले की भावना से ज़्यादा भारत की विचारधारा थी. नेहरू की विदेश नीति पर ही चल रहा भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़ा था और साइप्रस के राष्ट्रपति इस आंदोलन के बड़े नेता थे. साइप्रस के एक हिस्से पर तुर्की के कब्ज़े के खिलाफ भी भारत की इंदिरा गांधी सरकार ने कार्रवाई की थी….फिर आया 80 का दौर….1980 का दशक दोनों देशों के लिए अहम रहा. मुस्लिम देशों ने ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कॉर्पोरेशन नाम का एक संगठन बनाया था, जिसमें अरब और यूएई भी साथ आकर सक्रिय हो रहे थे, तो दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा नाज़ुक हो चला था. 1984 में राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने तुर्की के साथ संबंध बेहतर करने की कई कोशिशें कीं. बाद में नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी तुर्की का दौरा कर संबंध बेहतर करने की कोशिश की…..2001 में लगने लगा था कि दोनों देश दोस्ती की राह पर हैं, लेकिन फिर तुर्की में 2002 में इस्लामवाद के नाम पर अर्दोआन की पार्टी की सरकार सत्ता में आई. ए के पार्टी के नेता अर्दोआन ने न केवल तुर्की की पहचान बदलने की कोशिश की बल्कि मुस्लिम देशों में एक शक्ति बनने की भी चाहत बनाई. एक तरफ कश्मीर मुद्दे को अर्दोआन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाना शुरू किया, तो दूसरी तरफ, आपसी व्यापार में भारत के भारी पलड़े को भी मुद्दा बनाया….चूंकि तुर्की उन देशों में है, जिन्हें तेल और गैस के लिए आयात पर निर्भर रहना होता है इसलिए तुर्की ने परमाणु शक्ति भारत से अपने हित में थोरियम से बिजली बनाने की तकनीक चाही थी, मगर भारत इस पर राज़ी नहीं हुआ. 2017 और 2018 में अर्दोआन दो बार भारत आए लेकिन नाराज़ होकर गए. इसके बाद से भारत ने सऊदी अरब, इज़रायल, यूएई और अमेरिका के साथ बेहतर संबंधों को तवज्जो देना शुरू कर दिया और तुर्की के साथ संबंध फोकस से हट गए. ….इसी बीच यह भी हुआ कि इस्लामी आंदोलन के रूप में चर्चित गुलान मूवमेंट या फेतुल्ला मुहिम को तुर्की ने आतंकी घोषित किया और भारत से उम्मीद की कि इस मुहिम की भारत में सक्रियता भी खत्म हो, लेकिन भारत ने इससे इनकार कर दिया. तबसे अर्दोआन कश्मीर मुद्दा शिद्दत से उठाकर पाकिस्तान से सुरमिलाते रहे….दूसरी तरफ, भारत से न बनते देख अब तुर्की नेता अर्दोआन ने मुस्लिम देशों का खलीफा बनने की महत्वाकांक्षा पर फोकस करना शुरू कर दिया.राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि कतर के बहाने से सऊदी अरब पर दबाव बनाने, फिलस्तीनियों की मदद के लिए मदद भेजने, हगिया सोफिया को मस्जिद बनाने और मुसलमानों के मानवाधिकारों के मुद्दों पर चीखने जैसे कदम तुर्की की झुंझलाहट साबित करते है…शीतयुद्ध के जमाने से ही ऐसी दुश्मनी रह-रहकर सामने आ जाती है….दरअसल इस दुश्मनी की जड़े कहीं इतिहास में दफन हैं…. बात करें यदि 2016-17 की तो उस समय तुर्की में एक बड़ा प्रोटेस्ट हुआ….. जिसके लिए तुर्की के धार्मिक नेता फेतुल्लाह गुलान के संगठन को जिम्मेदार ठहराया गया था… तुर्की ने तब आरोप लगाया था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA उनका इस्तेमाल कर तुर्की में तख्तापलट करना चाहती है…. गुलान मूवमेंट भारत में भी देखा गया….ये वही समय था जब तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने भारत से उम्मीद जताई थी कि वो भारत में चल रहे गुलान मूवमेंट को बढ़ावा न दें….जो स्कूल दफ्तर हैं उन्हें बंद करवा दे…भारत ने तुर्की की अपील अनसुनी कर दी…ऐसा कहा जाता है….और यही बात तुर्की को नागवार गुजरी और तब से ही एर्दोगन लगातार कश्मीर के मुद्दे पर दखल देने लगे……इतना भर नहीं है…अभी पिछले पन्ने पलटे जाएं तो दुश्मनी की जड़ें कहीं बेहद गहरे तक धंसी हुई हैं……हाल ही में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने पाकिस्तानियों के प्रति हमदर्दी जताई …ये बात हम भारतीयों को तो बिल्कुल रास नहीं आई…इसीलिए बॉयकॉट टर्की ट्रेंड कर रहा है….लेकिन ये बी समझना जरूरी है आखिर क्यों है तुर्की खफा…क्या है इसके पीछे की कहानी….ये कहानी बस इतनी नहीं है अब इसे समझने के लिए हमें 800 साल पहले जाना होगा …..जिसके लिए हम एक और विश्लेषण बतायेंगे…क्रमश:

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