प्रेस परिषद में नया रंग: संबित पात्रा समेत तीन सांसदों की एंट्री…

khabar pradhan

संवाददाता

28 May 2025

अपडेटेड: 10:35 AM 0thGMT+0530

प्रेस परिषद में नया रंग: संबित पात्रा समेत तीन सांसदों की एंट्री…

प्रेस परिषद में नया रंग: संबित पात्रा समेत तीन सांसदों की एंट्री,

स्पीकर बिरला के फैसले ने मचाई हलचल

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने एक बड़ा फैसला लेते हुए तीन सांसदों—नरेश म्हस्के, कालीचरण मुंडा और संबित पात्रा—को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) का सदस्य नामित किया है। यह घोषणा न केवल सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है, बल्कि इसने भारतीय पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर भी नए सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर संबित पात्रा जैसे चर्चित चेहरे की एंट्री ने इस फैसले को और भी रोचक बना दिया है। आइए, इस फैसले के मायने, इसके पीछे की सियासत और इसके संभावित प्रभावों को करीब से समझते हैं।

प्रेस परिषद में नई तिकड़ी: कौन हैं ये सांसद?

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए तीन सांसदों को चुना है, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी के तेज-तर्रार नेता संबित पात्रा की हो रही है। संबित पात्रा, जो अपने बेबाक बयानों और टीवी डिबेट्स में आक्रामक शैली के लिए जाने जाते हैं, पुरी से लोकसभा सांसद हैं। उनके साथ ठाणे से बीजेपी सांसद नरेश म्हस्के और खूंटी से सांसद कालीचरण मुंडा को भी PCI का सदस्य बनाया गया है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक वैधानिक संस्था है, जो देश में प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने और पत्रकारिता के मानदंडों को लागू करने का काम करती है। इन तीन सांसदों की नियुक्ति ने न केवल PCI की कार्यप्रणाली में बदलाव की संभावना जताई है, बल्कि यह भी सवाल उठाए हैं कि क्या यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा।

संबित पात्रा: सियासत से प्रेस तक का सफर

संबित पात्रा का नाम भारतीय सियासत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर वह हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। उनके तीखे बयान, विपक्ष पर हमले और सोशल मीडिया पर सक्रियता ने उन्हें एक चर्चित चेहरा बना दिया है। लेकिन अब उनकी प्रेस काउंसिल में एंट्री ने सियासी और पत्रकारीय हलकों में हलचल मचा दी है।

कई लोग इसे एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं, क्योंकि संबित पात्रा की संचार कौशल और जनता से जुड़ने की कला PCI को और प्रभावी बना सकती है। एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “संबित पात्रा जैसे तेज-तर्रार नेता प्रेस काउंसिल को नई दिशा देंगे। यह पत्रकारिता के लिए अच्छा संकेत है।” लेकिन कुछ लोग इसे सत्ताधारी पार्टी के प्रेस पर बढ़ते प्रभाव के रूप में देख रहे हैं। एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, “संबित पात्रा की PCI में नियुक्ति प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है। क्या अब पत्रकारिता सरकार के इशारे पर चलेगी?”

नरेश म्हस्के और कालीचरण मुंडा: अनुभव और विविधता का मेल

नरेश म्हस्के, जो महाराष्ट्र के ठाणे से बीजेपी सांसद हैं, और कालीचरण मुंडा, जो झारखंड के खूंटी से सांसद हैं, इस तिकड़ी के अन्य दो महत्वपूर्ण चेहरे हैं। नरेश म्हस्के का स्थानीय स्तर पर मजबूत जनाधार और कालीचरण मुंडा का आदिवासी समुदाय में प्रभाव PCI को एक नया दृष्टिकोण दे सकता है। ये दोनों सांसद अपने-अपने क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं, और उनकी नियुक्ति से प्रेस काउंसिल में क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को बढ़ावा मिल सकता है।

स्पीकर ओम बिरला का यह फैसला दर्शाता है कि वह PCI में एक संतुलित प्रतिनिधित्व चाहते हैं, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के नेता शामिल हों। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तिकड़ी प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही को बनाए रखने में सक्षम होगी?

प्रेस काउंसिल का मिशन: स्वतंत्रता या नियंत्रण?

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का मुख्य उद्देश्य पत्रकारिता के नैतिक मानदंडों को बनाए रखना और प्रेस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना है। लेकिन हाल के वर्षों में इस संस्था पर सरकार के प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं। संबित पात्रा जैसे सत्ताधारी पार्टी के मजबूत चेहरे की नियुक्ति ने इन आशंकाओं को और हवा दी है।

कुछ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि यह नियुक्ति प्रेस पर सरकारी नियंत्रण को और मजबूत कर सकती है। एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा, “PCI में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की नियुक्ति प्रेस की आजादी के लिए खतरा हो सकती है। क्या अब पत्रकारों को अपनी बात कहने की आजादी मिलेगी?” वहीं, कुछ लोग इसे एक सकारात्मक कदम मानते हैं, क्योंकि संबित पात्रा जैसे अनुभवी संचारक पत्रकारिता के सामने आने वाली चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

ओम बिरला का फैसला: सियासी रणनीति या सुधार की कोशिश?

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। बिरला, जो अपनी निष्पक्षता और संसदीय कार्यवाही में पारदर्शिता के लिए जाने जाते हैं, ने इस नियुक्ति के जरिए प्रेस काउंसिल को नई ऊर्जा देने की कोशिश की है। संबित पात्रा जैसे चर्चित चेहरे को चुनकर उन्होंने यह संदेश दिया है कि PCI को और सक्रिय और प्रभावी बनाया जाएगा।

लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सियासी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। बीजेपी, जो पहले से ही मीडिया और संचार के क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति के लिए जानी जाती है, इस नियुक्ति के जरिए प्रेस काउंसिल पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती हो सकती है। यह कदम विपक्षी दलों के लिए भी एक नया मुद्दा बन सकता है, जो इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में पेश कर सकते हैं।

जनता की प्रतिक्रिया: उत्साह और आलोचना का मेल

सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। बीजेपी समर्थक इसे एक साहसिक कदम मान रहे हैं, जो प्रेस काउंसिल को और प्रभावी बनाएगा। एक यूजर ने लिखा, “संबित पात्रा जैसे तेज-तर्रार नेता PCI को नई दिशा देंगे। यह पत्रकारिता के लिए अच्छा कदम है।” वहीं, विपक्षी समर्थकों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे के रूप में देखा। एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, “संबित पात्रा की PCI में एंट्री प्रेस की आजादी के लिए खतरा है। क्या अब सरकार पत्रकारिता को कंट्रोल करेगी?”

क्या बदलेगा प्रेस काउंसिल?

इस नियुक्ति के बाद अब सवाल यह है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आएंगे। क्या संबित पात्रा, नरेश म्हस्के और कालीचरण मुंडा मिलकर पत्रकारिता के सामने आने वाली चुनौतियों, जैसे फेक न्यूज और पत्रकारों की सुरक्षा, से निपट पाएंगे? या फिर यह नियुक्ति सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रेस पर अपनी पकड़ मजबूत करने का एक जरिया बनेगी?

यह फैसला निश्चित रूप से प्रेस काउंसिल की दिशा और दशा को प्रभावित करेगा। संबित पात्रा जैसे संचारक की मौजूदगी PCI को और सक्रिय बना सकती है, लेकिन यह भी जरूरी है कि प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे।

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