निंदनीय है बलि प्रथा” बनाम “योगीजैसा बनने की होड़” – एक बयान, दो ध्रुव
संवाददाता
2 June 2025
अपडेटेड: 10:26 AM 0ndGMT+0530
भारतीय सामाजिक और धार्मिक मंचों पर एक बार फिर विवाद की आग भड़क उठी है। इस बार विवाद का केंद्र बने हैं बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री, जिन्होंने बकरीद के अवसर पर दी जाने वाली पशु बलि की प्रथा को “निंदनीय” करार दिया। उनके इस बयान ने न केवल धार्मिक भावनाओं को छुआ, बल्कि एक तीखी सियासी बहस को भी जन्म दे दिया। जवाब में, समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन ने धीरेंद्र शास्त्री पर पलटवार करते हुए कहा कि वे “योगी जैसा बनने की होड़” में हैं। यह बयानबाजी सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक चर्चा का विषय बन गई है। आइए, इस मुद्दे को गहराई से समझते हैं और देखते हैं कि कैसे एक धार्मिक टिप्पणी ने सियासी रंग ले लिया।
धीरेंद्र शास्त्री का बयान: बलि प्रथा पर सवाल
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री, जो अपनी बेबाकी और धार्मिक प्रवचनों के लिए लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय हैं, ने हाल ही में एक सभा में बकरीद के दौरान पशु बलि की प्रथा पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने इसे “अनुचित और निंदनीय” बताते हुए कहा कि आधुनिक युग में ऐसी प्रथाओं का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। शास्त्री ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि धार्मिक परंपराएं मानवता और करुणा के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। उनका यह बयान जहां उनके समर्थकों के बीच सराहा गया, वहीं इसने एक बड़े समुदाय की भावनाओं को आहत करने का काम भी किया।
एसटी हसन का करारा जवाब
धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान पर समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने शास्त्री के बयान को न केवल धार्मिक भावनाओं पर हमला बताया, बल्कि इसे सियासी रंग देते हुए कहा कि शास्त्री “योगी आदित्यनाथ जैसा बनने की होड़” में हैं। हसन ने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग धार्मिक मंचों का इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता बढ़ाने और सियासी ताकत हासिल करने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि धार्मिक प्रथाओं पर टिप्पणी करने से पहले उनकी गहरी समझ और संवेदनशीलता जरूरी है। हसन के इस बयान ने इस विवाद को और गर्म कर दिया, जिससे यह धार्मिक और सियासी दोनों ही स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया।
विवाद की जड़: धार्मिक संवेदनशीलता और सियासत का घालमेल
भारत जैसे देश में, जहां धर्म और संस्कृति लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं, धार्मिक प्रथाओं पर टिप्पणी हमेशा संवेदनशील रही है। बकरीद पर पशु बलि की प्रथा इस्लामिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे लेकर अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग विचार हैं। धीरेंद्र शास्त्री का बयान इस प्रथा को लेकर एक ध्रुवीकरण पैदा करने वाला साबित हुआ। वहीं, एसटी हसन ने इसे सियासी रंग देकर इस विवाद को और जटिल बना दिया। उनके “योगी जैसा बनने” वाले तंज ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या धार्मिक नेताओं का सियासत में दखल बढ़ रहा है?
सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग
इस विवाद ने सोशल मीडिया पर भी तूफान मचा दिया। धीरेंद्र शास्त्री के समर्थकों ने उनके बयान को पशु क्रूरता के खिलाफ एक साहसिक कदम बताया, जबकि विरोधियों ने इसे धार्मिक भावनाओं पर हमला करार दिया। , “शास्त्री जी ने सच बोला, बलि प्रथा को खत्म करना चाहिए,” जबकि अन्य ने जवाब दिया, “धार्मिक परंपराओं पर टिप्पणी करने से पहले उनकी समझ जरूरी है।” इस बीच, एसटी हसन के बयान को भी कुछ लोगों ने सियासी नौटंकी करार दिया, तो कुछ ने इसे धार्मिक सहिष्णुता की रक्षा के रूप में देखा।
पशु बलि: एक पुरानी बहस
पशु बलि का मुद्दा भारत में नया नहीं है। यह समय-समय पर विभिन्न समुदायों और संगठनों के बीच बहस का विषय बनता रहा है। पशु अधिकार संगठन इस प्रथा को क्रूरता मानते हैं, जबकि धार्मिक समुदाय इसे अपनी आस्था और परंपरा का हिस्सा बताते हैं। धीरेंद्र शास्त्री का बयान इस बहस को फिर से हवा देने वाला साबित हुआ है। उनके बयान ने न केवल धार्मिक भावनाओं को छुआ, बल्कि पशु क्रूरता और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी चर्चा में ला दिया।
सियासत और धर्म का गठजोड़
एसटी हसन का “योगी जैसा बनने” वाला बयान इस विवाद को सियासी रंग देने का एक स्पष्ट प्रयास था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि एक कट्टर हिंदू नेता के रूप में रही है, और हसन का यह तंज शास्त्री को उसी छवि से जोड़ने की कोशिश थी। यह बयान इस बात की ओर भी इशारा करता है कि भारत में धर्म और सियासत का गठजोड़ कितना जटिल हो चुका है। धार्मिक बयानबाजी को सियासी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस तरह के बयान सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डालते हैं।
सहिष्णुता की जरूरत
इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ है कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक देश में संवेदनशील मुद्दों पर बोलते समय सावधानी बरतने की जरूरत है। धार्मिक प्रथाओं पर टिप्पणी करने से पहले उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। साथ ही, सियासी नेताओं को भी ऐसे बयानों से बचना चाहिए जो सामाजिक तनाव को बढ़ाने का काम करें।