Pitru Paksha 2025 : पितृपक्ष का महत्व और तर्पण का रहस्य
संवाददाता
6 September 2025
अपडेटेड: 11:08 AM 0thGMT+0530
6 सितंबर 2025: पितृपक्ष क्या है?
पितृपक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, हिन्दू परंपरा का वह पवित्र काल है जब हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं और उनके लिए तर्पण एवं श्राद्ध करते हैं। यह काल भाद्रपद मास की पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होकर अश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। लगभग 15–16 दिनों तक चलने वाली इस अवधि में श्रद्धालु अपने दिवंगत पितरों को तृप्त करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
मान्यता है कि इस समय पितरों की आत्माएँ अपने वंशजों से आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आती हैं। इसी कारण इस काल में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनका स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आत्मा की तृप्ति का वास्तविक स्वरूप
मानव शरीर को स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दो भागों में बांटा गया है।
- स्थूल शरीर जीवित रहते हुए भोजन, वस्त्र और अन्य भौतिक वस्तुओं पर निर्भर करता है।
- सूक्ष्म शरीर मृत्यु के बाद रह जाता है, जिसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी या भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती।
सूक्ष्म शरीर की तृप्ति श्रद्धा, सद्भावना और कृतज्ञता से होती है।
- श्रद्धा ही पितरों की भूख है।
- कृतज्ञता और शुभकामनाएँ ही उनका अन्न हैं।
- पवित्र वातावरण और सत्कर्म ही उनका जल और अमृत हैं।
जब हम पितरों के लिए श्रद्धा और प्रेम से तर्पण करते हैं, तो उन्हें वास्तविक शांति और तृप्ति का अनुभव होता है।
तर्पण का महत्व और प्रक्रिया
तर्पण का अर्थ है – जल अर्पित करके तृप्त करना। इसमें मुख्य रूप से जल प्रयोग होता है, जिसमें तिल, चावल, दूध और फूल जैसी शुभ वस्तुएँ मिलाई जाती हैं। कुशा की सहायता से अंजलि बनाकर जल को दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित किया जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को यमलोक की दिशा माना गया है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है भावना।
- यदि केवल औपचारिकता निभाई जाए तो तर्पण का कोई विशेष फल नहीं मिलता।
- यदि श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम के साथ तर्पण किया जाए, तो पितरों को वास्तविक तृप्ति प्राप्त होती है।
तर्पण का उद्देश्य केवल जल चढ़ाना नहीं, बल्कि यह अनुभव करना है कि –
“मैं अपने पूर्वजों के चरणों में श्रद्धा और कृतज्ञता का पुष्प अर्पित कर रहा हूँ।”
तर्पण के छह प्रकार
पितृपक्ष में केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि समस्त मानवता और देवशक्तियों के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त की जाती है। तर्पण को छह भागों में विभाजित किया गया है –
- देव तर्पण – जलवायु सूर्य अग्नि चंद्र विद्युत तथा अवतारी ईश्वर अंशु की मुक्त आत्माओं जैसी देवशक्तियाँ और विद्या, बुद्धि, शक्ति प्रतिभा, करुणा दया, प्रसन्नता, पवित्रता जैसी दिव्य प्रवृत्तियों के प्रति कृतज्ञता।
- ऋषि तर्पण – व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, याज्ञवल्क्य कात्यायन, जमदग्नि, गौतम, पाणिनि, दधीचि, वशिष्ठ विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत जैसे ऋषियों को स्मरण और उनके उपकारों के प्रति श्रद्धा।
- दिव्य मनुष्य तर्पण – वे महापुरुष जिन्होंने त्याग और बलिदान से लोककल्याण किया, जैसे हरिश्चंद्र, रंतिदेव, शिवि, जनक, पांडव, शिवाजी, प्रताप, भामाशाह, तिलक आदि।
- दिव्य पितृ तर्पण – वे पूर्वज जिन्होंने आदर्श जीवन जिया l अपना चरित्र हर दृष्टि से आदर्श बनाए रखा, उस पर किसी तरह की आंच न आने दी lऔर अपने परिवार-समाज को संस्कार एवं प्रतिष्ठा दी।
- यम तर्पण – जन्म मरण की व्यवस्था करने वाली शक्ति को यम कहते हैं l राज्य शासन को भी यह कहते हैं l उनके प्रति अपने कर्तव्यों, आत्मसंयम और विवेक का स्मरण यम तर्पण कहलाता है।
- मनुष्य पितृ तर्पण – अपने परिवार के पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य दिवंगत रिश्तेदारों का तर्पण।
इसके अलावा भीष्म तर्पण भी किया जाता है, जो उन महामानवों के प्रति कृतज्ञता है जिन्होंने उच्च उद्देश्यों के लिए व्यक्तिगत जीवन और वंश का त्याग कर दिया।
पितृकर्म का वास्तविक उद्देश्य
पितृकर्म का उद्देश्य केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि –
- पूर्वजों के उपकारों का स्मरण करना,
- उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लेना,
- परिवार और समाज को संस्कारयुक्त एवं आदर्श बनाना है।
जब हम तर्पण करते हैं, तो यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, बल्कि यह आत्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।
पितृपक्ष में क्या करना चाहिए?
- तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करें।
- जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और दान दें।
- सत्संग, भजन-कीर्तन और जप करें।
पितृपक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
- कोई नया कार्य (जैसे विवाह, गृह प्रवेश, व्यवसाय की शुरुआत) न करें।
- मांस, मद्यपान और तामसिक भोजन से परहेज करें।
- दिखावे और आडंबर से बचें।
श्राद्ध का सही समय कब है?
प्रत्येक तिथि का श्राद्ध उसी तिथि पर निधन हुए पितरों के लिए किया जाता है। जिनकी तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या को किया जाता है।
पितृपक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का उत्सव है। तर्पण केवल जल चढ़ाने की क्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है जिसमें हम अपने पितरों के उपकारों को स्वीकारते हैं और उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं।
जब हम सच्ची भावना से तर्पण करते हैं, तो पितरों को शांति और तृप्ति मिलती है और वे अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हैं।