नवरात्रि में क्यों करते हैं नौ देवियों की पूजा: क्यों और कैसे… आइये जानें इसका गूढ़ रहस्य
संवाददाता
19 September 2025
अपडेटेड: 2:19 PM 0thGMT+0530
19 सितंबर 2025 : भारतीय संस्कृति में शक्ति साधना का अद्भुत स्थान है। यहाँ स्त्री को “शक्ति” कहा गया है और इसी शक्ति के विविध रूपों को नवरात्रि में पूजा जाता है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है, पर चैत्र और शारदीय नवरात्रि का महत्व सर्वाधिक है। इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है।
नवरात्र और महिषासुर वध की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुरों का राजा महिषासुर अत्यंत बलशाली और अहंकारी था। उसने कठोर तप करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई देवता या दानव नहीं मार सकेगा। वरदान पाकर महिषासुर ने तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया। देवता भी उससे भयभीत हो गए।
तब त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) ने अपनी शक्तियों को मिलाकर देवी दुर्गा का प्राकट्य किया। देवी ने 9 दिनों तक महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया। हर दिन उन्होंने अपने अलग-अलग स्वरूप में असुरों का संहार किया। दसवें दिन उन्होंने महिषासुर का वध किया और देवताओं को मुक्त कराया।
यही कारण है कि नवरात्र के 9 दिन देवी के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन विजयादशमी के रूप में असत्य पर सत्य की जीत का उत्सव मनाया जाता है।
नवरात्र में 9 देवियों की पूजा क्यों?
- शैलपुत्री – स्थिरता और सौभाग्य देती हैं।
- ब्रह्मचारिणी – संयम और तपस्या का प्रतीक।
- चंद्रघंटा – भय का नाश करती हैं।
- कूष्मांडा – सृजन शक्ति और ऊर्जा प्रदान करती हैं।
- स्कंदमाता – मातृत्व और करुणा का स्वरूप।
- कात्यायनी – साहस और विवाह संबंधी समस्याओं का निवारण।
- कालरात्रि – अंधकार और नकारात्मक शक्तियों का विनाश।
- महागौरी – पवित्रता और सौंदर्य का वरदान।
- सिद्धिदात्री – सभी सिद्धियाँ और मोक्ष प्रदान करती हैं।
आध्यात्मिक कारण:
प्रत्येक देवी का स्वरूप जीवन की किसी न किसी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। इनकी पूजा से साधक के भीतर साहस, भक्ति, शांति, प्रेम और आत्मज्ञान का विकास होता है।
ग्रह शांति:
नवदुर्गा के 9 रूप 9 ग्रहों से भी जुड़े हैं। अतः इनकी साधना से जीवन के ग्रहदोष शांत होते हैं और समृद्धि आती है।
नवरात्र में पूजा कैसे की जाती है?
कलश स्थापना:
पहले दिन कलश स्थापना होती है जिसे घटस्थापना कहते हैं। इसे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। कलश में आम्रपत्र, सुपारी, जल और नारियल रखकर देवी का आह्वान किया जाता है।
नौ दिनों की आराधना और भोग:
- पहला दिन (शैलपुत्री) – घी का भोग।
- दूसरा दिन (ब्रह्मचारिणी) – शक्कर।
- तीसरा दिन (चंद्रघंटा) – दूध।
- चौथा दिन (कूष्मांडा) – कद्दू या मालपुआ।
- पाँचवा दिन (स्कंदमाता) – केले।
- छठा दिन (कात्यायनी) – शहद।
- सातवाँ दिन (कालरात्रि) – गुड़।
- आठवाँ दिन (महागौरी) – नारियल।
- नवाँ दिन (सिद्धिदात्री) – तिल।
भोग अर्पित करने के बाद आरती और मंत्रजाप किए जाते हैं। दुर्गा सप्तशती और देवी कवच का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
पूजा के पीछे का कारण और महत्व:
आध्यात्मिक दृष्टि से:
नवरात्र आत्मशुद्धि का पर्व है। यह साधना हमें बताती है कि जीवन की हर चुनौती से लड़ने की शक्ति हमारे भीतर ही है।
सामाजिक दृष्टि से:
नवरात्र में लोग सामूहिक रूप से गरबा, डांडिया और भजन-कीर्तन करते हैं। इससे समाज में एकता, प्रेम और उत्साह का वातावरण बनता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से:
नवरात्रि ऋतु परिवर्तन का समय है। इस दौरान उपवास और सात्त्विक आहार लेने से शरीर डिटॉक्स होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
महिषासुर वध और जीवन का संदेश:
महिषासुर केवल एक राक्षस नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता का प्रतीक है। देवी दुर्गा का नौ दिनों तक युद्ध यह बताता है कि नकारात्मक प्रवृत्तियों का अंत तुरंत नहीं होता, बल्कि निरंतर साधना और शक्ति संचय से ही संभव है।
नवमी तक देवी हर रूप में असुर शक्तियों को परास्त करती हैं और दशमी को विजय प्राप्त करती हैं। यही कारण है कि इसे विजयादशमी कहा जाता है।
नवरात्र केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशक्ति जागरण का पर्व है। यह हमें बताता है कि हर इंसान के भीतर देवी शक्ति विद्यमान है। हमें बस उसे साधना, संयम और भक्ति से जगाना होता है।
नवदुर्गा की पूजा से जीवन में संतुलन, साहस, भक्ति और समृद्धि आती है। महिषासुर वध की कथा यह संदेश देती है कि असत्य, अहंकार और अज्ञान चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सत्य और शक्ति के आगे उसका अंत निश्चित है।
इसलिए कहा जाता है –
“नवरात्र की साधना केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को जगाने का साधन है।”