कामाक्षी माता शक्तिपीठ: 51 शक्तिपीठों में से एक, जहां गिरी थी माता की नाभि

khabar pradhan

संवाददाता

27 September 2025

अपडेटेड: 10:07 AM 0thGMT+0530

कामाक्षी माता शक्तिपीठ: 51 शक्तिपीठों में से एक, जहां गिरी थी माता की नाभि

27 सितंबर 2025 : कामाक्षी माता शक्तिपीठ, कांचीपुरम : कथा, इतिहास और वर्तमान स्वरूप

भारत भूमि पर देवी शक्ति की अनेकों उपासना स्थली हैं, जिन्हें शक्तिपीठ कहा जाता है। इन्हीं में से एक है — कामाक्षी माता शक्तिपीठ, जो तमिलनाडु राज्य के प्राचीन नगर कांचीपुरम में स्थित है। यह शक्तिपीठ देवी के उन 51 महाशक्तिपीठों में से एक है जहाँ सती का अंग गिरा था। कामाक्षी का अर्थ है — “काम को , अक्षी (नेत्र) के रूप में धारण करने वाली” अर्थात् ऐसी देवी जो साधक की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं।

यह स्थल न केवल शाक्त परंपरा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि कांचीपुरम की आध्यात्मिक पहचान का भी केन्द्र है। आइए, इस पावन शक्तिपीठ की कथा, स्थापत्य, धार्मिक महत्व और वर्तमान स्वरूप को विस्तार से जानते हैं।

शक्तिपीठ की उत्पत्ति कथा:

शक्तिपीठों की स्थापना की कथा सती और शिव के प्रसंग से जुड़ी है। जब दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो उनकी पत्नी सती ने आत्माहुति दे दी। शोकाकुल शिव सती का शरीर लेकर आकाश में विचरण करने लगे। ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने लगा। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को अनेक टुकड़ों में विभक्त कर दिया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, कांचीपुरम में सती की नाभि गिरी थी। इस कारण यहाँ देवी शक्ति का रूप कामाक्षी के नाम से प्रकट हुआ।

कामाक्षी देवी का स्वरूप:

कामाक्षी माता को त्रिपुरा सुंदरी और ललिता महात्रिपुरसुंदरी के रूप में भी पूजा जाता है।

देवी की मुख्य प्रतिमा बैठी मुद्रा (पद्मासन) में है, जो भारतीय परंपरा में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है।

माता के चार हाथ हैं — एक हाथ में पाश, दूसरे में अंकुश, तीसरे में गन्ने का धनुषऔर चौथे में पुष्प बाण।

देवी के साथ ही यहाँ भैरव की उपस्थिति भी मानी जाती है, जैसा कि प्रत्येक शक्तिपीठ पर होता है।

ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व:

कामाक्षी मंदिर का निर्माण पल्लव वंश के समय (लगभग 7वीं शताब्दी) में हुआ और बाद में चोल तथा विजयनगर राजाओं ने इसमें विस्तार कराया।

मंदिर का गर्भगृह अत्यंत रहस्यमय और शक्तिपूर्ण माना जाता है।

विशाल गोपुरम (प्रवेश द्वार), पत्थर की जटिल नक्काशियाँ और देवी के विभिन्न रूपों के चित्रण इस मंदिर को स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय बनाते हैं।

मंदिर में सप्तविद्या, नवरत्न और श्रीचक्र से संबंधित स्थापत्य शाक्त उपासना की गहराई को दर्शाता है।

कामाक्षी माता से जुड़ी पौराणिक कथाएँ:

त्रिपुरा संहार की कथा:
मान्यता है कि कामाक्षी देवी ने भगवान शिव को त्रिपुरासुरों का वध करने के लिए शक्ति प्रदान की। इसीलिए उन्हें त्रिपुरसुंदरी भी कहा जाता है।

ललिता सहस्रनाम से संबंध:
देवी ललिता सहस्रनाम, जो शाक्त उपासना का आधार है, कामाक्षी देवी से ही जुड़ा हुआ है। कांचीपुरम को “श्रीविद्या साधना” का प्रमुख केन्द्र माना जाता है।

विष्णु और लक्ष्मी की आराध्या
स्थानीय कथाओं में वर्णन है कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी ने भी यहाँ आकर कामाक्षी की साधना की थी।

धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव:

कामाक्षी माता मंदिर में वर्ष भर अनेक उत्सव और साधनाएँ होती हैं।

नवरात्रि : शारदीय और चैत्र नवरात्रि यहाँ अत्यंत धूमधाम से मनाए जाते हैं।

वासंता उत्सव : वसंत ऋतु में देवी की शोभायात्रा और विशेष पूजन होता है।

फाल्गुन पूर्णिमा : इस दिन विशेष श्रीचक्र पूजा का आयोजन होता है।

प्रतिदिन मंदिर में ललिता सहस्रनाम पाठ और श्रीविद्या उपासना होती है।

आध्यात्मिक महत्व:

कामाक्षी देवी को मुक्ति प्रदान करने वाली और कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी कहा जाता है।

साधक मानते हैं कि देवी की आराधना से विद्या, समृद्धि, संतान सुख और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

श्रीविद्या साधना की प्रमुख पीठ होने के कारण यह स्थान भारत और विदेशों से आने वाले साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है।

कांचीपुरम का महत्व:

कांचीपुरम को “सात मोक्षपुरियों” में गिना जाता है। यहाँ वैष्णव और शैव मंदिरों की भी भरमार है। परंतु कामाक्षी मंदिर इसकी आध्यात्मिक आत्मा माना जाता है।

कांचीपुरम को “सिल्क सिटी” भी कहा जाता है, जहाँ कामाक्षी देवी की कृपा से रेशमी वस्त्र उद्योग का अत्यधिक विकास हुआ।

यह नगर आज भी दक्षिण भारत के धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केन्द्र है।

वर्तमान स्वरूप:

आज कामाक्षी माता मंदिर हिन्दुओं के लिए श्रद्धा का केन्द्र है, जहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं।

मंदिर का प्रबंधन शंकराचार्य मठ द्वारा देखा जाता है।

आधुनिक सुविधाओं के साथ तीर्थयात्रियों के लिए व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं।

यहाँ का वातावरण साधना और भक्ति से परिपूर्ण रहता है।

कामाक्षी माता शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति साधना का महासागर है। यह स्थल बताता है कि शक्ति और शिव का मिलन ही सृष्टि का आधार है।

कांचीपुरम की भूमि पर विराजमान कामाक्षी देवी आज भी भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं और उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं।

कामाक्षी शक्तिपीठ भारतीय संस्कृति, शाक्त परंपरा और आध्यात्मिक साधना का जीवित प्रतीक है। यहाँ की यात्रा हर साधक को जीवन की नई ऊर्जा और आंतरिक शांति का अनुभव कराती है।

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