नरक चतुर्दशी (रूप चौदस): अंधकार से प्रकाश, पाप से पवित्रता की ओर यात्रा
संवाददाता
16 October 2025
अपडेटेड: 10:07 AM 0thGMT+0530
16 अक्टूबर 2025: दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी या रूप चौदस के नाम से जाना जाता है।
यह दिन धनतेरस के अगले दिन और मुख्य दीपावली के एक दिन पूर्व मनाया जाता है।
जहाँ धनतेरस आरोग्य और समृद्धि का प्रतीक है, वहीं नरक चतुर्दशी आत्मशुद्धि, सौंदर्य, और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है।
यह पर्व केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं, बल्कि इसका गहरा दार्शनिक और वैदिक महत्व भी है —
यह अंधकार, पाप और नकारात्मकता के अंत का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी का वैदिक और पौराणिक आधार:
“चतुर्दशी” का अर्थ है — कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि।
इस दिन सूर्य और चंद्रमा के बीच का संतुलन विशेष रूप से संवेदनशील होता है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यह तिथि “तामसिक” प्रवृत्तियों को नष्ट करने और “सात्त्विक ऊर्जा” के जागरण का समय है।
इसी कारण इसे नरक नाशिनी चतुर्दशी भी कहा गया है।
पौराणिक दृष्टि से यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस के वध से जुड़ा है।
भगवान विष्णु के वरदान से अभिमानी बना नरकासुर, प्रजा को अत्याचारों से पीड़ित करता था।
उसने 16,000 कन्याओं को बंदी बना रखा था।
भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी मुक्ति के लिए युद्ध किया और इस दिन नरकासुर का वध किया।
जब युद्ध समाप्त हुआ, तो श्रीकृष्ण प्रातः स्नान कर द्वारका लौटे, उनके शरीर पर तेल और धूल लगी थी।
तब उनकी पत्नी सत्यभामा ने उन्हें तेल से स्नान करवाया।
इसी से इस दिन अभ्यंग स्नान, सौंदर्य-परिचर्या, और रूप सौंदर्य की आराधना की परंपरा शुरू हुई।
रूप चौदस: सौंदर्य और शुद्धता का पर्व:
“रूप चौदस” नाम स्वयं इस बात का द्योतक है कि यह दिन रूप, सौंदर्य और आंतरिक तेज के जागरण का प्रतीक है।
भारतीय संस्कृति में “रूप” केवल बाहरी सुंदरता तक सीमित नहीं है — यह शरीर, मन और आत्मा की आभा का प्रतीक है।
रूप चौदस की परंपराएँ और उनके अर्थ:
- अभ्यंग स्नान (तेल स्नान):
इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पहले तेल मलकर स्नान करने की परंपरा है।
इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है।
आयुर्वेद के अनुसार, यह शरीर की शुद्धि, रक्तसंचार, और मानसिक शांति के लिए लाभकारी है।
यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर शरीर को तेज और मन को प्रसन्न करता है। - सुगंध और सौंदर्य का प्रयोग:
स्नान के बाद चंदन, इत्र, और हल्दी जैसी प्राकृतिक चीज़ों का उपयोग किया जाता है।
यह न केवल त्वचा को सुंदर बनाती हैं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती हैं। - दीपदान और पूजा:
शाम को घर के हर कोने में दीप जलाए जाते हैं।
यह अंधकार रूपी नरक को दूर करने और ज्ञान के प्रकाश के स्वागत का प्रतीक है। - यमराज के लिए दीपदान (यमदीप):
इस दिन भी घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज की पूजा की जाती है।
यह दीप मृत्यु भय से मुक्ति और दीर्घायु की कामना का प्रतीक है।
नरकासुर वध की कथा और उसका प्रतीकात्मक अर्थ:
पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर एक अत्याचारी राक्षस था, जिसने देवराज इंद्र का छत्र और कान्ति छीन ली थी।
उसके अत्याचार से तीनों लोक त्रस्त हो गए थे।
भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के साथ मिलकर उसका वध किया।
यह कथा केवल अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक नहीं है, बल्कि एक गहरा संदेश देती है —
नरकासुर हमारे भीतर के अज्ञान, अहंकार और नकारात्मक भावों का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण का वध इस बात का संकेत है कि जब मन में ज्ञान (कृष्ण) और चेतना (सत्यभामा) का मेल होता है,
तब भीतर के अंधकार का अंत हो जाता है।
रूप चौदस का आध्यात्मिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण से महत्व:
- शरीर की शुद्धि = आत्मा की पवित्रता:
तेल मालिश और स्नान से शरीर में स्फूर्ति आती है।
यह केवल बाहरी शुद्धि नहीं, बल्कि आंतरिक नकारात्मकता को दूर करने का प्रतीक भी है।
यह आत्मा को पवित्र और मन को स्थिर करता है। - रूप का अर्थ ‘तेज’ है:
“रूप” का अर्थ केवल सुंदरता नहीं, बल्कि तेज, आभा और ओज भी है।
इस दिन का उद्देश्य अपने भीतर छिपे दिव्य रूप को पहचानना और जगाना है। - अभ्यंग स्नान की वैज्ञानिकता:
आयुर्वेदिक दृष्टि से अभ्यंग स्नान शरीर की तंत्रिकाओं को सक्रिय करता है,
रक्तचाप को नियंत्रित रखता है और तनाव को कम करता है।
यह त्वचा और मस्तिष्क को पुनर्जीवित करता है।
आधुनिक युग में नरक चतुर्दशी की प्रासंगिकता:
आज के व्यस्त और प्रदूषित जीवन में, मनुष्य धीरे-धीरे अपने शरीर और मन दोनों से दूर होता जा रहा है।
तनाव, चिंता और असंतुलन से जीवन में ‘नरक’ जैसी स्थिति बन रही है।
ऐसे में यह पर्व हमें आत्मशुद्धि और संतुलन की दिशा में लौटने की प्रेरणा देता है।
- आत्म-देखभाल का महत्व:
रूप चौदस हमें सिखाता है कि अपनी देखभाल स्वार्थ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है।
अपने शरीर और मन को समय देना आध्यात्मिक अभ्यास का ही हिस्सा है।
- नकारात्मकता से मुक्ति:
नरकासुर का वध हमें यह याद दिलाता है कि
हर व्यक्ति के भीतर नकारात्मक भाव — क्रोध, ईर्ष्या, और अहंकार — छिपे होते हैं।
यह दिन उन सबका अंत करने और आत्मा के उज्ज्वल स्वरूप को पहचानने का अवसर है।
- प्रकृति और स्वास्थ्य के प्रति आभार:
तेल, फूल, सुगंध, और जल जैसे प्राकृतिक तत्वों का प्रयोग हमें याद दिलाता है कि
सौंदर्य का वास्तविक स्रोत प्रकृति ही है।
यह दिन हमें पर्यावरण के साथ सामंजस्य में जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
नरक चतुर्दशी और दीपावली का संबंध:
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है।
यह मुख्य दीपावली की पूर्वसंध्या है — यानी प्रकाश पर्व से ठीक पहले अंधकार का अंत।
यह क्रम अपने आप में एक आध्यात्मिक यात्रा है —
धनतेरस → नरक चतुर्दशी → दीपावली:
जहाँ शरीर की शुद्धि, मन की पवित्रता और आत्मा का प्रकाश — तीनों चरणों में विकसित होते हैं।
नरक चतुर्दशी अथवा रूप चौदस केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं,
बल्कि यह अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य, और अशुद्धता से पवित्रता की ओर यात्रा का प्रतीक है।
वैदिक दृष्टि से यह दिन शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करने का अवसर प्रदान करता है।
भगवान श्रीकृष्ण का नरकासुर वध हमें यह सिखाता है कि
“जब हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे ज्ञान के प्रकाश से मिटाते हैं,
तब ही सच्चे अर्थों में दीपावली मनाते हैं।”
इस रूप चौदस पर हम सब यह संकल्प लें —
हम अपने शरीर, मन और विचारों को शुद्ध रखें,
नकारात्मकता से मुक्त होकर अपने भीतर के रूप यानी दिव्यता को जगाएँ।
शुभ नरक चतुर्दशी एवं रूप चौदस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
आपका जीवन प्रकाश, स्वास्थ्य, और आनंद से परिपूर्ण रहे l