सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी खबर निकाल कर आ रही है। खबर ये है कि अभी जेल में ही रहेंगे उमर खालिद और शरजील इमाम । उमर खालिद और शरजील इमाम को कोर्ट से बड़ा झटका लगा है । लंबे इंतजार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है, जबकि इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को राहत देते हुए जमानत मंजूर कर ली गई है ।
आईए जाने क्यों नहीं मिली जमानत:
उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत क्यों नहीं मिली
और बाकी आरोपियों को कोर्ट ने किन आधारों पर राहत दी।
ये मामला 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश का है, जिसमें गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के तहत कई लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से जमानत की मांग की थी…लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जिस तरह के सबूत उनके खिलाफ मिल रहे हैं। उनको देखते हुए। उन सबूतों के आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम पर प्रथम दृष्टि में गंभीर आरोप बनते हैं, जो UPA की धारा 43D(5) के तहत तय वैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं। जो लोग इन आरोपियों की पैरवी करते हुए कह रहे थे कि वो लंबे समय से जेल में हैं ।उनके लिए भी कोर्ट ने बिल्किल स्पष्ट कर दिया कि लंबे समय तक हिरासत में रहना, जमानत मिलने का आधार नहीं हो सकता । इस देरी को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर जब मामला यूएपीए जैसे सख्त कानून के तहत दर्ज हो।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक:
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि हर आरोपी की भूमिका का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी है और सभी आरोपियों को एक ही तराजू में तौलना न्यायसंगत नहीं होगा। अदालत ने अपने फैसले में एक बेहद अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी साजिश में कुछ लोगों की ‘केंद्रीय भूमिका’ होती है, जबकि कुछ आरोपी केवल सहायक या मददगार भूमिका में होते हैं । और इन दोनों के बीच फर्क किए बिना फैसला करना मनमाना होगा । सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका बाकी आरोपियों से अलग है और ज्यादा गंभीर दिखाई देती है । इसी वजह से कोर्ट ने इस चरण पर उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया । कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि आतंकी कृत्य केवल प्रत्यक्ष हिंसा या जान-माल के नुकसान तक ही सीमित नहीं होते, जरूरी सेवाओं में बाधा डालना और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करना भी इसके दायरे में आता है। कोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने जो सामग्री पेश की, उससे ये संकेत मिलता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ पहली दृष्टि में ही यूएपीए के तहत अपराध बनता है, और इसलिए मौजूदा स्तर पर उन्हें राहत नहीं दी जा सकती । हालांकि, इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर ,शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को कड़ी शर्तों के साथ जमानत दे दी है । कोर्ट ने साफ किया कि इन आरोपियों को जमानत मिलने का मतलब ये नहीं है कि उनके खिलाफ आरोप कमजोर है। अगर जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ, तो ट्रायल कोर्ट को जमानत रद्द करने का पूरा अधिकार होगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई लगातार चलनी चाहिए,जिससे ट्रायल में अनावश्यक देरी न हो । कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों और उनकी टीम द्वारा दी गई सहायता की भी सराहना की ।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश:
सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि यूएपीए जैसे मामलों में जमानत का फैसला बेहद सावधानी और आरोपी की भूमिका को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा । सभी आरोपी एक जैसे नहीं होते, और कानून में यही अंतर न्याय का आधार बनता है. । हालांकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आतंकवाद केवल हिंसा तक सीमित नहीं, बल्कि देश के संसाधनों और आवश्यक सेवाओं को बाधित करना भी इसके दायरे में आता है।
उमर खालिद के समर्थन हेतु अंतरराष्ट्रीय खेल:
सुनवाई से कुछ दिन पहले न्यूयार्क के मेयर ममदानी का एक पत्र वायरल हुआ, जिसमें उमर खालिद के प्रति सहानुभूति दिखाई गई…तो ठीक सुनवाई से पहले ममदानी के सहानुऊत् पत्र का पूरा खेल विदेश में बैठकर रचा गया। औऱ कोर्ट के फैसले पर बादा डालने की कोशिश की गई। एक तरह से दबाव बनाया गया। अब ये पूरा पत्र का खेल कहीं ना कहीं इशारा कर रहा है कि उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोगों के लिए आज भी एक बहुत बड़ी यूनिट काम कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट से
जमानत याचिका खारिज होने के बाद कोर्ट इनके लिए सजा का क्या प्रावधान देती है । यह देखना दिलचस्प होगा।
जेल में ही रहेंगे उमर खालिद और शरजील: दिल्ली दंगे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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