बिहार चुनाव 2025. ओवैसी की रणनीति से नीतीश पर संकट
संवाददाता
6 June 2025
अपडेटेड: 11:01 AM 0thGMT+0530
Bihar elections 2025. Crisis for Nitish due to Owaisi's strategy.
महागठबंधन के साथ गठजोड़ की चर्चा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सियासी हलचल तेज कर दी है. ओवैसी की पार्टी बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए को चुनौती देने के लिए महागठबंधन के साथ गठजोड़ करने की योजना बना रही है. इस रणनीति ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस को भी सोच में डाल दिया है. ओवैसी का यह कदम बिहार की सियासत में नया मोड़ ला सकता है और नीतीश कुमार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.
एआईएमआईएम बिहार में पहले भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है. खासकर सीमांचल क्षेत्र में पार्टी का प्रभाव बढ़ा है जहां मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. ओवैसी ने हाल ही में संकेत दिए कि उनकी पार्टी आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है. इस संभावित गठबंधन से नीतीश कुमार और बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है. सूत्रों के मुताबिक ओवैसी की रणनीति सीमांचल की 20 से ज्यादा सीटों पर केंद्रित है जहां उनकी पार्टी का जनाधार मजबूत है.
महागठबंधन के नेताओं तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के साथ ओवैसी की बातचीत की खबरें भी सामने आई हैं. हालांकि इस गठजोड़ को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. आरजेडी और कांग्रेस के लिए यह गठबंधन फायदेमंद हो सकता है क्योंकि ओवैसी का प्रभाव मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने में मदद कर सकता है. लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की बीजेपी की बी-टीम के रूप में देखे जाने की छवि महागठबंधन के लिए जोखिम भरी हो सकती है. फिर भी ओवैसी का यह दांव बिहार के सियासी समीकरणों को बदलने की क्षमता रखता है.
बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीतकर सबको चौंकाया था. अब ओवैसी की नजर और ज्यादा सीटों पर है. उनकी रणनीति एनडीए के वोट बैंक में सेंध लगाने की है खासकर उन क्षेत्रों में जहां अल्पसंख्यक और दलित मतदाता निर्णायक हैं. दूसरी ओर नीतीश कुमार और बीजेपी इस संभावित गठबंधन को कमजोर करने के लिए अपनी रणनीति बना रहे हैं. बिहार की सियासत में यह नया गठजोड़ कितना असर डालेगा यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा. फिलहाल ओवैसी का यह कदम सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है.