पाकिस्तान के साथ युद्धविराम: रणनीतिक भूल या मजबूरी?

khabar pradhan

संवाददाता

11 May 2025

अपडेटेड: 10:24 AM 0thGMT+0530

पाकिस्तान के साथ युद्धविराम: रणनीतिक भूल या मजबूरी?

पाकिस्तान के साथ युद्धविराम: रणनीतिक भूल या मजबूरी?

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम (सीजफायर) के फैसले ने एक बार फिर देश में बहस छेड़ दी है। सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने एक बार फिर जीत की दहलीज पर पहुंचकर अपने हाथ से मौका गंवा दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न केवल भारत की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है, बल्कि इतिहास की उन गलतियों को भी दोहराता है, जिनसे देश को सबक लेना चाहिए था। आइए, इस फैसले के विभिन्न पहलुओं और इसके पीछे की वजहों पर विस्तार से नजर डालते हैं।

सीजफायर का फैसला: क्यों और कैसे?

10 मई 2025 को भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्धविराम स्वीकार किया। यह निर्णय तब आया, जब भारत की सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को नष्ट करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की थी। सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चैलानी जैसे जानकारों का कहना है कि भारत के पास यह सुनहरा मौका था कि वह कुछ और समय तक आक्रामक रुख अपनाकर पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर देता। लेकिन वैश्विक दबाव और अमेरिका की मध्यस्थता के चलते भारत ने अपनी शर्तों पर यह सीजफायर स्वीकार किया।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और तनाव को कम करने के लिए यह कदम जरूरी था। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्थिरता भारत के दीर्घकालिक हितों को सुरक्षित रख पाएगी?

इतिहास से सबक न लेने का आरोप

विशेषज्ञों ने 1948 के युद्ध की याद दिलाई, जब भारत ने कश्मीर में जीत की स्थिति में युद्धविराम स्वीकार कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) अस्तित्व में आया। सामरिक विश्लेषकों का कहना है कि 2025 का यह सीजफायर भी उसी तरह की रणनीतिक भूल साबित हो सकता है। पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपी वैद ने तो यहां तक कहा कि सेना को 2-3 दिन और समय देना चाहिए था, ताकि पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को और नुकसान पहुंचाया जा सकता।

वैद का यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य रणनीति के बीच राजनीतिक निर्णयों के टकराव को उजागर करता है। क्या भारत ने एक बार फिर जल्दबाजी में फैसला लिया, या यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था?

सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस सीजफायर को लेकर जनता के बीच जबरदस्त नाराजगी देखी जा रही है। कई यूजर्स का मानना है कि भारत ने अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल नहीं किया और एक बार फिर पाकिस्तान को हल्के में लिया। एक यूजर ने लिखा, “जब हम जीत रहे थे, तो रुकने की क्या जरूरत थी? यह देश की जनता के साथ धोखा है।” वहीं, कुछ लोग इस फैसले को कूटनीतिक जीत मान रहे हैं, क्योंकि इससे भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी जिम्मेदार छवि को और मजबूत किया।

क्या कहते हैं आंकड़े और तथ्य?

ऑपरेशन सिंदूर:
इस अभियान में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 50 से अधिक आतंकी ठिकानों को नष्ट किया।

वैश्विक दबाव:
संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने दोनों देशों पर युद्धविराम के लिए दबाव बनाया, ताकि क्षेत्र में शांति स्थापित हो सके।

आर्थिक प्रभाव:
युद्धविराम से भारत और पाकिस्तान दोनों को अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने का मौका मिलेगा, जो युद्ध के कारण प्रभावित हो रही थी।

चुनौतियां और संभावनाएं

यह युद्धविराम भारत के लिए एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है। एक ओर, यह क्षेत्रीय शांति और कूटनीतिक स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है। दूसरी ओर, अगर पाकिस्तान इस मौके का फायदा उठाकर अपने आतंकी नेटवर्क को फिर से मजबूत करता है, तो भारत के लिए यह रणनीतिक नुकसान होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को अपनी खुफिया एजेंसियों और सैन्य तैयारियों को और मजबूत करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचा जा सके।

जीत या हार?

भारत का यह सीजफायर का फैसला इतिहास के पन्नों में किस तरह दर्ज होगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि इसने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य रणनीति और कूटनीति के बीच संतुलन की बहस को जन्म दिया है। क्या भारत ने वाकई जीत के करीब पहुंचकर हार चुनी, या यह एक ऐसी रणनीति थी, जिसके परिणाम भविष्य में दिखेंगे?

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