धनतेरस: आरोग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वैदिक उत्सव

khabar pradhan

संवाददाता

14 October 2025

अपडेटेड: 7:29 AM 0thGMT+0530

धनतेरस: आरोग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वैदिक उत्सव

14 अक्टूबर 2025 : भारत में दीपावली का त्योहार पाँच दिनों तक चलने वाला उल्लास, प्रकाश और श्रद्धा का पर्व है। इन पाँच दिनों में पहला दिन धनतेरस कहलाता है, जो न केवल धन और व्यापार से जुड़ा है, बल्कि वैदिक परंपरा में स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि का प्रतीक भी माना गया है। आज के युग में जब भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ रही हैं लेकिन स्वास्थ्य और मानसिक शांति संकट में हैं, तब धनतेरस का महत्व और भी गहरा हो जाता है।

वैदिक काल में धनतेरस का आधार:

धनतेरस का उल्लेख सीधे “धनतेरस” नाम से वैदिक ग्रंथों में नहीं मिलता, लेकिन इसका मूल वैदिक देवता धन्वंतरि से जुड़ा हुआ है।
ऋग्वेद और अथर्ववेद में स्वास्थ्य, औषधि और आरोग्य से संबंधित कई मंत्र पाए जाते हैं।
इनमें “धन्वंतरि” को आयुर्वेद के जनक के रूप में सम्मानित किया गया है।
महाभारत के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ, तब चौदह रत्नों में से एक धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना गया, जिन्होंने संसार को रोगमुक्त करने के लिए आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया।

“धन्वंतरि” शब्द का अर्थ ही है – धन अर्थात स्वास्थ्य-संपदा और अंतरि अर्थात धारण करने वाला।
अर्थात् धनतेरस केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि शरीर और मन की संपन्नता का भी प्रतीक है।

धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथा:

धनतेरस से संबंधित एक प्रसिद्ध कथा राजा हेम के पुत्र की मृत्यु और यमराज की कृपा से जुड़ी है।
कथा के अनुसार, राजा हेम के पुत्र की मृत्यु सर्पदंश से होने वाली थी।
जब उसके विवाह के कुछ ही दिन बीते थे, तब ज्योतिषियों ने बताया कि चौदहवीं की रात उसका अंत निश्चित है।
उसकी नवविवाहिता पत्नी ने उस रात घर के द्वार पर बहुत सारा सोना, चांदी और दीपक रख दिए, ताकि घर भीतर से तेज़स्वी दिखाई दे।
जब यमराज सर्प का रूप लेकर वहां पहुँचे, तो सोने-चांदी की चमक और दीपकों के प्रकाश से उनकी आँखें चकाचौंध हो गईं।
उसी समय नववधू अपने पति को कथा सुनाते हुए भगवान विष्णु का नाम ले रही थी।
यमराज लौट गए और उस युवक का जीवन बच गया।
तब से यह दिन “धनत्रयोदशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ और दीपदान, यमराज की पूजा तथा धन की आराधना की परंपरा आरंभ हुई।

धनतेरस का धार्मिक और सामाजिक महत्व:

  1. भगवान धन्वंतरि की आराधना*

इस दिन लोग भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं, ताकि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त हो।
वैदिक परंपरा में कहा गया है —

“आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।”
अर्थात् स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

  1. धन और समृद्धि की प्रतीक पूजा**

धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन या नया सामान खरीदने की परंपरा है।
यह शुभ माना जाता है, क्योंकि यह “नव आरंभ” का प्रतीक है।
लोग मानते हैं कि इस दिन खरीदी गई वस्तु पूरे वर्ष शुभ फल देती है।

  1. दीपदान और यमराज की आराधना:

रात के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में एक दीपक जलाया जाता है।
यह दीपक “यम दीपक” कहलाता है।
यह प्रतीक है – जीवन की नश्वरता को स्वीकारते हुए, मृत्यु के भय को ज्ञान और प्रकाश से जीतने का।

  1. आरोग्य एवं आयुर्वेद का उत्सव:

आधुनिक समय में यह दिन राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
क्योंकि धन्वंतरि देव ने मानवता को आयुर्वेद जैसे विज्ञान का ज्ञान दिया, जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर आधारित है।

धनतेरस के वैदिक और सांस्कृतिक प्रतीक:

  • धन – केवल पैसे या वस्तुओं तक सीमित नहीं, बल्कि “धन” का अर्थ है धार्मिकता, नैतिकता, स्वास्थ्य, और संतोष।
  • तेरस (त्रयोदशी) – अंक 13 को शुभ माना जाता है, क्योंकि यह त्रयोदशी तिथि है, जो परिवर्तन और पुनरुत्थान का प्रतीक है।
  • दीपक– अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक, यह हमें जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बनाए रखने का संदेश देता है।
  • आयुर्वेद – शरीर, मन और आत्मा के संतुलन से वास्तविक “धन” प्राप्त करने का साधन।

धनतेरस का आर्थिक और सामाजिक पहलू:

भारत की अर्थव्यवस्था में यह पर्व विशेष स्थान रखता है।
इस दिन व्यापार, ज्वेलरी, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और गृह-सज्जा के क्षेत्र में भारी खरीददारी होती है।
लोग इसे “वर्ष के सबसे शुभ खरीदारी दिवस” के रूप में मानते हैं।
कहा जाता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु दीर्घकाल तक फल देती है।
लेकिन असली उद्देश्य केवल खर्च नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और समृद्ध विचार का संचरण है।

आज के संदर्भ में धनतेरस की प्रासंगिकता:

आज का समाज भौतिक रूप से संपन्न होता जा रहा है, परंतु मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहा है।
ऐसे में धनतेरस हमें यह स्मरण कराता है कि —

“सच्चा धन सोना-चांदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, संतुलन और शांति है।”

धनतेरस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने शरीर और मन की देखभाल करें।
योग, ध्यान और आयुर्वेद को अपनाकर हम संतुलित जीवन जी सकते हैं।

दीपक का प्रकाश केवल घर नहीं, मन को भी रोशन करता है।
आज जब प्रदूषण और तनाव बढ़ रहा है, तो यह त्योहार हमें प्रकृति और आंतरिक शुद्धता की ओर लौटने का संदेश देता है।

धनतेरस हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा धन बाहरी नहीं, बल्कि भीतर की प्रसन्नता और संतोष में है।
यही कारण है कि वैदिक ग्रंथों में “धन” को “सद्गुण” और “पुण्य” से जोड़ा गया है।

धनतेरस केवल खरीदारी या उत्सव का दिन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है –
जहाँ धन का अर्थ भौतिक समृद्धि से आगे बढ़कर आध्यात्मिक और शारीरिक कल्याण तक विस्तृत है।
वैदिक युग से आज तक यह पर्व हमें यही सिखाता आया है कि —
“सच्चा धन वह है जो जीवन में प्रकाश, स्वास्थ्य और सद्भाव लाए।”

आज जब मनुष्य अंधाधुंध भौतिकता के पीछे भाग रहा है, धनतेरस हमें संतुलन, स्वास्थ्य, और प्रकाश की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
इसलिए इस दिन दीपक जलाते समय यह संकल्प करें —

“हम अपने भीतर और समाज में स्वास्थ्य, सकारात्मकता और करुणा का प्रकाश फैलाएँ।”

शुभ धनतेरस!
आपके जीवन में आरोग्य, समृद्धि और आनंद सदैव बना रहे।

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