ग्वालियर हाई कोर्ट में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति स्थापना पर विवाद…
संवाददाता
23 May 2025
अपडेटेड: 12:10 PM 0rdGMT+0530
Dispute over the establishment of a statue of Babasaheb Ambedkar in Gwalior High Court...
मायावती ने जताई कड़ी नाराजगी
भारत के संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के प्रतीक, परमपूज्य बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति को लेकर मध्य प्रदेश के ग्वालियर हाई कोर्ट परिसर में उपजा विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस मुद्दे ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा को जन्म दिया है। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इस विवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की है। यह घटना सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों के सम्मान को लेकर कई सवाल खड़े कर रही है। आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।
मूर्ति स्थापना पर असहमति
ग्वालियर हाई कोर्ट की नई इमारत में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति स्थापित करने का निर्णय कोर्ट के निर्देश पर लिया गया था। इस प्रक्रिया में अधिवक्ताओं की मांग और उनके आर्थिक सहयोग को भी शामिल किया गया। मूर्ति के लिए स्थान का चयन और चबूतरा निर्माण भी कोर्ट के निर्देशानुसार हुआ। मूर्ति बनकर तैयार है, लेकिन कुछ वकीलों के एक समूह ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका तर्क है कि मूर्ति स्थापना से परिसर की सौंदर्यता या अन्य व्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके विपरीत, कई अधिवक्ता और सामाजिक संगठन मूर्ति स्थापना के समर्थन में हैं, जो इसे बाबासाहेब के योगदान को सम्मान देने का प्रतीक मानते हैं।
विरोध की हद तब हो गई जब कुछ वकीलों ने कथित तौर पर महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदतमीजी की और जबरदस्ती राष्ट्रीय ध्वज लगाकर माहौल को गरमाने की कोशिश की। इस घटना ने सामाजिक तनाव को और बढ़ा दिया, जिसे कई लोग ‘जातंकवाद’ का रूप दे रहे हैं।
मायावती का कड़ा रुख: संविधान का अपमान अस्वीकार्य
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने इस घटना को संविधान और बाबासाहेब के अपमान से जोड़ते हुए इसे गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब अंबेडकर केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समानता की नींव हैं। उनकी मूर्ति स्थापना का विरोध न केवल उनके सम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि यह देश के संवैधानिक ढांचे पर भी सवाल उठाता है। मायावती ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की घटनाएं नहीं रुकीं, तो बीएसपी सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करेगी।
मायावती ने यह भी स्पष्ट किया कि बाबासाहेब की मूर्ति स्थापना का निर्णय कोर्ट के निर्देश पर हुआ है, और इसे रोकना न केवल कोर्ट की अवमानना है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के खिलाफ भी है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कई यूजर्स ने इसे ‘जातंकवाद’ का नाम देते हुए कहा कि बाबासाहेब की मूर्ति स्थापना का विरोध सामाजिक एकता के खिलाफ एक सुनियोजित प्रयास है। एक यूजर ने लिखा, “हमारी सेना आतंकवाद से लड़ सकती है, लेकिन जातंकवाद के खिलाफ हमें खुद खड़ा होना होगा। बाबासाहेब की मूर्ति तो लगेगी, और यह समय है जातीय भेदभाव को खत्म करने का।”
वहीं, कुछ लोगों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय ध्वज से जोड़कर तर्क दिया कि कोई भी मूर्ति राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर नहीं हो सकती। ग्वालियर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के एक पूर्व अध्यक्ष ने दावा किया कि मूर्ति स्थापना के लिए चुना गया स्थान उपयुक्त नहीं है। हालांकि, इस तर्क को कई लोगों ने खारिज करते हुए इसे बाबासाहेब के योगदान को कमतर करने की कोशिश बताया।
बाबासाहेब का योगदान: एक प्रेरणा
डॉ. भीमराव अंबेडकर को न केवल भारत के संविधान का निर्माता माना जाता है, बल्कि वे सामाजिक न्याय, समानता और दलित-वंचित वर्गों के उत्थान के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी मूर्ति स्थापना को उनके विचारों और सिद्धांतों को जीवित रखने का प्रतीक माना जाता है। ग्वालियर में इस विवाद ने एक बार फिर उनके योगदान को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
सामाजिक समरसता की जरूरत
यह विवाद केवल एक मूर्ति स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, संवैधानिक सम्मान और समानता के मूल्यों की बात करता है। सरकार और कोर्ट को इस मामले में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई करनी होगी ताकि समाज में तनाव को रोका जा सके। मायावती ने पहले भी ऐसी घटनाओं पर सख्त रुख अपनाया है और समाज से अपील की है कि बाबासाहेब के विचारों को अपनाकर सामाजिक एकता को मजबूत किया जाए।
एकता और सम्मान का संदेश
ग्वालियर हाई कोर्ट में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति स्थापना का विवाद एक गंभीर मुद्दा है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में उन मूल्यों को जी रहे हैं, जिन्हें बाबासाहेब ने संविधान के माध्यम से हमें सौंपा था। यह समय है कि समाज एकजुट होकर इस तरह के विवादों को सुलझाए और बाबासाहेब के सपनों के भारत को साकार करे। मायावती की नाराजगी और सामाजिक संगठनों का समर्थन इस बात का संकेत है कि बाबासाहेब का सम्मान हर हाल में बरकरार रहेगा।