कामाख्या देवी मंदिर: एक रहस्यमई-चमत्कारी मंदिर-जहां देवी आज भी जीवित है
संवाददाता
23 September 2025
अपडेटेड: 10:13 AM 0rdGMT+0530
23 सितंबर 2025: कामाख्या देवी शक्तिपीठ गुवाहाटी : तंत्र साधना और आस्था का विश्वप्रसिद्ध केंद्र
भारत की भूमि देवी-देवताओं की कथाओं और आस्था से ओत-प्रोत है। यहाँ 51 शक्तिपीठों का उल्लेख मिलता है, जहाँ माता सती के अंग गिरे थे। इन्हीं में से सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली पीठों में से एक है कामाख्या शक्तिपीठ, जो असम की राजधानी गुवाहाटी के नीलाचल पर्वत पर स्थित है। इसे न केवल तांत्रिक साधना का केंद्र माना जाता है, बल्कि यह पूरे उत्तर-पूर्व भारत की धार्मिक पहचान भी है।
पौराणिक कथा:
शिव पुराण और कलिका पुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने जब यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती ने आत्मदाह कर लिया। भगवान शिव शोक में सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया।
जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि गुवाहाटी स्थित नीलाचल पर्वत पर माता सती का योनि (जननांग) गिरी थी। इसी कारण यहाँ देवी का स्वरूप कामाख्या देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। “काम” का अर्थ है इच्छा और “अख्या” का अर्थ है दृष्टि या शक्ति। इस प्रकार कामाख्या का अर्थ है — इच्छा की देवी, सृष्टि शक्ति की देवी।
धार्मिक महत्व:
तंत्र साधना का केंद्र – कामाख्या मंदिर को तांत्रिक साधकों का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यहाँ तंत्र साधना और सिद्धि की विशेष परंपरा है।
स्त्री-शक्ति का प्रतीक – यहाँ देवी की मूर्ति किसी प्रतिमा के रूप में नहीं है, बल्कि प्राकृतिक शिला और झरने के रूप में पूजित होती है। इसे स्त्री शक्ति और जनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
अंबुबाची मेला – वर्ष में एक बार जून-जुलाई में यहाँ प्रसिद्ध अंबुबाची मेला लगता है। मान्यता है कि इस दौरान देवी ऋतु धर्म (मासिक धर्म) में होती हैं और मंदिर के गर्भगृह के द्वार तीन दिन तक बंद रहते हैं। चौथे दिन विशाल मेले के साथ मंदिर के पट खुलते हैं। यह मेला लाखों श्रद्धालुओं और साधकों को आकर्षित करता है।
कामरूप क्षेत्र का महत्व – प्राचीन काल में इस क्षेत्र को “कामरूप” कहा जाता था, जहाँ तंत्र और शक्ति साधना का उद्गम माना जाता है।
मंदिर का स्थापत्य:
कामाख्या मंदिर का वर्तमान स्वरूप 17वीं शताब्दी में कोच राजा नर नारायण और उनके भाई चिलाराय ने पुनर्निर्मित कराया। मंदिर की वास्तुकला हिंदू और इस्लामी शैलियों का मिश्रण है।
मंदिर का गुंबद “बीहाइव” (मधुमक्खी के छत्ते) की आकृति का है।
गर्भगृह (गर्भगृह) में देवी का प्रतीक योनि शिला है, जिस पर प्राकृतिक झरने का जल सतत बहता रहता है।
मंदिर परिसर में दस महाविद्याओं के अन्य मंदिर भी स्थित हैं – जैसे तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, मातंगी, धूमावती आदि।
पूरा परिसर लाल रंग के पत्थरों और शिल्प से सजा हुआ है, जो इसे अद्भुत बनाता है।
पूजा-पद्धति:
साधारण दिन – सुबह-सुबह स्नान के बाद भक्त फूल, नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित करते हैं।
विशेष अनुष्ठान – बलि प्रथा यहाँ की प्राचीन परंपरा का हिस्सा रही है। आजकल बलि मुख्यतः बकरे या भैंसे की दी जाती है, हालाँकि कई लोग प्रतीकात्मक नारियल बलि भी करते हैं।
नवरात्रि और अंबुबाची – इन अवसरों पर विशेष अनुष्ठान और तंत्र साधना होती है।
यहाँ तांत्रिक गुरु और साधक साधनाएँ करते हैं, जिनमें मंत्र-जप, यंत्र और हवन का विशेष महत्व है।
त्योहार और मेलें:
अंबुबाची मेला – देवी की शक्ति का सबसे बड़ा उत्सव।
दुर्गा पूजा और नवरात्रि – भारी धूमधाम से मनाए जाते हैं।
मनसा पूजा – नागदेवी और शक्ति पूजा का भी आयोजन यहाँ होता है।
ऐतिहासिक महत्व:
कामाख्या मंदिर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों कलिका पुराण और योगिनी तंत्र में मिलता है। यह मंदिर सदियों से राजाओं, साधकों और भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा है।
16वीं शताब्दी में इसे आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया था।
17वीं शताब्दी में कोच वंश के राजा नर नारायण ने इसे पुनः स्थापित किया।
इसके बाद से यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा तीर्थस्थल बन गया।
कैसे पहुँचें:
स्थान – नीलाचल पहाड़ी, गुवाहाटी, असम
हवाई मार्ग – गुवाहाटी का लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम है (लगभग 20 किमी)।
रेल मार्ग – गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से मंदिर लगभग 8 किमी दूर है।
सड़क मार्ग – गुवाहाटी शहर से टैक्सी, बस या ऑटो रिक्शा द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
आसपास के दर्शनीय स्थल:
उमानंद मंदिर – ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित शिव मंदिर।
उमानंद द्वीप – प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत स्थल।
असम राज्य संग्रहालय – असम के इतिहास और संस्कृति का दर्शन।
नवग्रह मंदिर – नौ ग्रहों को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर।
गुवाहाटी चिड़ियाघर और वनस्पति उद्यान – परिवार और बच्चों के लिए आकर्षण।
विशेष मान्यताएँ:
कामाख्या मंदिर में देवी की पूजा प्रतिमा रूप में नहीं होती, बल्कि प्राकृतिक योनि शिला पर होती है।
यह मंदिर कामरूप कामाख्या के रूप में भी प्रसिद्ध है और इसे प्रेम, प्रजनन, शक्ति और तंत्र साधना का केंद्र माना जाता है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहाँ की मिट्टी और जल में अलौकिक शक्ति है, जो साधकों की सिद्धि और भक्तों की इच्छाओं की पूर्ति करती है।
कामाख्या देवी शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि स्त्री-शक्ति और तंत्र साधना का वैश्विक प्रतीक है। यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि सृष्टि की मूल शक्ति शक्ति ही है। गुवाहाटी का यह पावन स्थल हर भक्त को आध्यात्मिक अनुभव, मानसिक शांति और अलौकिक ऊर्जा प्रदान करता है।
जो भी श्रद्धालु यहाँ आता है, वह कामाख्या माता की कृपा से समृद्धि, शक्ति और आशीर्वाद लेकर लौटता है। इस प्रकार कामाख्या शक्तिपीठ न केवल असम की, बल्कि पूरे भारतवर्ष की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है।