दिवाली के दूसरे दिन क्यों की जाती है गोवर्धन पूजा और क्यों कहते हैं इसे अन्नकूट जानिए
Khabar Pradhan Desk
संवाददाता
18 October 2025, 6:24 AM
18 अक्टूबर 2025: गोवर्धन पूजा: प्रकृति, कृतज्ञता और संतुलन का पर्व
दीपावली के अगले दिन पूरे भारत में हर्ष और श्रद्धा के साथ गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पर्व मनाया जाता है।
यह दिन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार, संतुलन और संरक्षण का प्रतीक है।
यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि हमारी समृद्धि और अस्तित्व, प्रकृति और गोमाता से गहराई से जुड़ा हुआ है।
गोवर्धन पूजा का वैदिक और पौराणिक आधार:
“गोवर्धन” शब्द का अर्थ है — गौ (गाय) + वर्धन (पोषण करने वाला), अर्थात् वह पर्वत जो गायों और प्रकृति का पोषण करता है।
वैदिक युग में गौ, भूमि और पर्वत को देवत्व का स्थान प्राप्त था।
ऋग्वेद में वर्णन है कि —
“पृथिव्याḥ पुत्रोऽहम्” — “मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।”
इस भावना के साथ मानव और प्रकृति का गहरा संबंध था।
गोवर्धन पूजा इसी वैदिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है —
प्रकृति, वर्षा, पशुधन और अन्न के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का उत्सव।
गोवर्धन पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय गोकुल और वृंदावन में लोग भगवान इंद्र की पूजा करते थे,
क्योंकि वे वर्षा के देवता माने जाते थे।
एक दिन बालक श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा —
“हमारा जीवन पर्वत, नदियाँ, गोवंश और खेतों से चलता है।
इसलिए हमें इंद्र नहीं, गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए,
क्योंकि वही हमें जल, अन्न और जीवन प्रदान करता है।”
ब्रजवासी श्रीकृष्ण की बात मान गए और उन्होंने इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पूजा की।
इंद्र इससे क्रोधित हुए और उन्होंने भयंकर वर्षा भेजी।
तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया
और सात दिनों तक समस्त ब्रजवासियों और गायों की रक्षा की।
इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी।
यह घटना केवल एक चमत्कारिक कथा नहीं, बल्कि एक गहरी शिक्षा है —
कि प्रकृति की पूजा और संरक्षण ही सच्ची भक्ति है।
गोवर्धन पूजा का धार्मिक महत्व:
गोवर्धन पूजा भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक है।
यह हमें सिखाती है कि ईश्वर का सच्चा रूप प्रकृति में ही विद्यमान है।
- प्रकृति पूजा का प्रतीक:
गोवर्धन पर्वत धरती, वर्षा, अन्न, पशु और मनुष्य — सभी को जोड़ने वाला प्रतीक है।
इस दिन हम पृथ्वी, जल, वनस्पति और पशुधन की पूजा करते हैं,
जो जीवन के मूल आधार हैं।
- अन्नकूट का अर्थ:
“अन्नकूट” का अर्थ है — अन्न का विशाल भंडार या पर्वत।
इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर गोवर्धन पर्वत के रूप में अर्पित किए जाते हैं।
यह कृतज्ञता और सामूहिकता का भाव दर्शाता है।
- गोसेवा का महत्व:
इस दिन गायों की विशेष पूजा की जाती है, उन्हें नहलाया जाता है,
सजाया जाता है और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया जाता है।
गौमाता को ‘धेनु देवी’ कहा गया है, जो जीवन, दूध और समृद्धि का स्रोत हैं।
गोवर्धन पूजा विधि
- पूजन की तैयारी:
- घर या मंदिर के आँगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का रूप बनाते हैं।
- इसके चारों ओर दीपक, पुष्प और जल से सजावट की जाती है।
- पर्वत के आसपास गोमाता, श्रीकृष्ण और ब्रजवासियों के छोटे-छोटे चित्र या मूर्तियाँ रखी जाती हैं।
- पूजन सामग्री:
गोबर, गोमूत्र, फूल, दीपक, धूप, हल्दी, चावल, जल, दूध, दही, गुड़, अन्नकूट (भोजन), तुलसी पत्र, और प्रसाद।
- पूजन क्रम:
(क)संकल्प और आह्वान:
पूजा शुरू करने से पहले संकल्प लें —
“हम प्रकृति, गाय और गोवर्धन पर्वत की आराधना कर रहे हैं,
ताकि हमारे जीवन में समृद्धि, संतुलन और शांति बनी रहे।”
(ख) गोवर्धन पर्वत पूजा:
गोबर से बने पर्वत पर जल, फूल, चावल, दीपक और नैवेद्य अर्पित करें।
फिर भगवान श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन करें।
(ग) अन्नकूट भोग:
विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे खीर, पूरी, सब्जियाँ, मिठाइयाँ आदि पर्वताकार रूप में सजाकर अर्पित करें।
यह “अन्न पर्वत” भगवान कृष्ण को समर्पित किया जाता है।
(घ) परिक्रमा:
पूजन के बाद परिवारजन गोवर्धन पर्वत की सात परिक्रमा करते हैं।
यह पृथ्वी और जीवन के चक्र के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
(ङ) गौ पूजन:
गायों की पूजा कर उन्हें गुड़, चना या हरी घास खिलाई जाती है।
यह गोमाता के प्रति प्रेम और कृतज्ञता का भाव दर्शाता है।
गोवर्धन पूजा के प्रतीक और अर्थ :
गोवर्धन पर्वत =प्रकृति और जीवन का आधार |
गोबर = पवित्रता, उर्वरता और पर्यावरण संतुलन
अन्नकूट भोग =अन्न और श्रम का सम्मान
गौ पूजा =करुणा, पोषण और कृतज्ञता
दीपदान =आशा, विश्वास और सामूहिकता |
आधुनिक युग में गोवर्धन पूजा की प्रासंगिकता:
आज जब मनुष्य प्रकृति से दूर और कृत्रिम जीवन में बंध गया है,
गोवर्धन पूजा हमें स्मरण कराती है कि —
प्रकृति ही हमारी माता है, और उसका संरक्षण ही हमारी जिम्मेदारी।
- पर्यावरण संरक्षण का संदेश:
गोबर से पर्वत बनाना, प्राकृतिक वस्तुओं से पूजा करना —
यह सब हमें बताता है कि **प्रकृति-संगत जीवन ही स्थायी विकास का मार्ग है।
- ग्रामीण जीवन और आत्मनिर्भरता का सम्मान:
यह पर्व गाँव, किसान और गोसेवा की परंपरा को जीवित रखता है।
यह आत्मनिर्भर भारत की जड़ों से जुड़ा उत्सव है।
- सामूहिकता और साझा आनंद:
अन्नकूट भोज में सब मिलकर भोजन करते हैं —
यह सामाजिक समरसता और समानता का सुंदर उदाहरण है।
- ईको-फ्रेंडली उत्सव का प्रेरक उदाहरण:
गोवर्धन पूजा में प्लास्टिक या रासायनिक वस्तुओं का प्रयोग नहीं होता।
यह प्रकृति-संरक्षण का आदर्श तरीका है, जो आधुनिक पर्यावरण संकट का समाधान भी है।
आध्यात्मिक दृष्टि से गोवर्धन पूजा का अर्थ:
गोवर्धन पूजा केवल पर्वत या अन्न की आराधना नहीं है,
बल्कि यह हमारे अहंकार के त्याग और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण ने हमें यह सिखाया कि —
“सच्ची पूजा वही है जो दूसरों के हित में हो,
जो प्रकृति, पशु और मनुष्य के बीच संतुलन स्थापित करे।”
गोवर्धन पूजा हमें यह सिखाती है कि
प्रकृति, गोमाता और अन्न ही हमारे वास्तविक देवता हैं।
इनके प्रति सम्मान और आभार ही सच्ची समृद्धि है।
आज के युग में, जब मानव स्वार्थवश पर्यावरण को नष्ट कर रहा है,
यह पर्व हमें धरती के प्रति श्रद्धा और जिम्मेदारी का भाव सिखाता है।
इसलिए इस गोवर्धन पूजा पर हम यह संकल्प लें —
“हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, पशुओं का सम्मान करेंगे,
और अपने जीवन में सादगी, करुणा और संतुलन अपनाएँगे।”
शुभ गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!
आपका जीवन प्रकृति की तरह समृद्ध, संतुलित और आनंदमय हो।