लिव-इन में दो साल से ज्यादा साथ रहने पर सहमति मानी जाएगी

khabar pradhan

संवाददाता

9 May 2025

अपडेटेड: 11:12 AM 0thGMT+0530

लिव-इन में दो साल से ज्यादा साथ रहने पर सहमति मानी जाएगी

लिव-इन में दो साल से ज्यादा साथ रहने पर सहमति मानी जाएगी

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि अगर कोई जोड़ा दो साल से अधिक समय तक साथ रहता है, तो यह माना जाएगा कि उनके बीच स्वैच्छिक सहमति है। इस फैसले ने एक दुष्कर्म के मामले में दर्ज FIR को रद्द कर दिया, जिससे लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए कानूनी स्थिति और स्पष्ट हो गई है। यह निर्णय समाज में बदलते रिश्तों और कानूनी मान्यताओं को दर्शाता है।

दुष्कर्म का आरोप खारिज, सहमति पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े के बीच शारीरिक संबंधों को सहमति के आधार पर देखा जाएगा, खासकर जब दोनों दो साल से ज्यादा समय तक एक साथ रह रहे हों। कोर्ट ने एक मामले में दुष्कर्म की FIR को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि अगर रिश्ता लंबे समय तक बना रहा और दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से साथ रहने का फैसला किया, तो बाद में इसे दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सहमति को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होगी।

मामले की पृष्ठभूमि: लिव-इन से विवाद तक
यह मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा था, जिसमें एक महिला ने अपने पार्टनर पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। दोनों कई सालों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे थे। महिला ने दावा किया कि शादी का वादा तोड़ा गया, जिसके आधार पर उसने FIR दर्ज कराई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दोनों ने लंबे समय तक स्वेच्छा से साथ रहकर रिश्ते को बनाए रखा था। कोर्ट ने इसे सहमति का आधार मानते हुए कहा कि शादी का वादा टूटना दुष्कर्म का आधार नहीं बन सकता। इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति और आपसी समझ को कानूनी मान्यता दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क: सामाजिक बदलाव को स्वीकारा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सामाजिक बदलावों को ध्यान में रखते हुए कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप अब भारतीय समाज में स्वीकार्य हो चुके हैं। कोर्ट ने 2015 के अपने एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि अगर एक जोड़ा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहता है, तो उन्हें कानूनी रूप से विवाहित माना जाएगा, और महिला को संपत्ति का उत्तराधिकार भी मिल सकता है। इस नए फैसले ने लिव-इन रिलेशनशिप को और मजबूत कानूनी आधार प्रदान किया है, बशर्ते रिश्ता दो साल से अधिक समय तक चले।

कानूनी और सामाजिक प्रभाव
इस फैसले का समाज और कानून पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को अधिक सुरक्षा और स्पष्टता प्रदान करेगा। साथ ही, यह उन मामलों को कम कर सकता है, जहां रिश्ते टूटने के बाद बदले की भावना से दुष्कर्म के आरोप लगाए जाते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया कि सहमति से बने संबंधों और दुष्कर्म के बीच स्पष्ट अंतर करना जरूरी है।

लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति की परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सहमति का मतलब हर स्तर पर स्वैच्छिक सहमति होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर रिश्ते में दोनों पक्ष लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं, तो यह सहमति का मजबूत संकेत है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर कोई पक्ष यह साबित कर दे कि सहमति जबरदस्ती या धोखे से ली गई थी, तो वह इस अनुमान को चुनौती दे सकता है। यह प्रावधान उन मामलों में सुरक्षा प्रदान करता है, जहां रिश्ते में धोखाधड़ी या दबाव शामिल हो।
सामाजिक स्वीकार्यता और चुनौतियां
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को सामाजिक रूप से स्वीकार्य बताया है, लेकिन भारतीय समाज में अभी भी इसे लेकर कई रूढ़ियां मौजूद हैं। कई परिवार और समुदाय लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के समान मानने से इनकार करते हैं। इस फैसले से उन जोड़ों को कानूनी समर्थन मिलेगा, जो बिना शादी के साथ रहना चुनते हैं। साथ ही, यह फैसला उन महिलाओं के लिए भी राहत की बात है, जो लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद अपने अधिकारों की मांग करती हैं।

पिछले फैसलों से प्रेरणा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में 2013 और 2015 के अपने पुराने निर्णयों का भी उल्लेख किया। 2013 में कोर्ट ने संसद से लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं और उनके बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की सिफारिश की थी। 2015 में कोर्ट ने कहा था कि लिव-इन रिलेशनशिप में जन्मे बच्चे वैध हैं और उन्हें संपत्ति का अधिकार मिलेगा। ये सभी फैसले लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी और सामाजिक मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहे हैं।

जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और समाचार मंचों पर इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे प्रगतिशील कदम मान रहे हैं, जो आधुनिक रिश्तों को स्वीकार करता है, जबकि कुछ इसे पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ देख रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला लिव-इन जोड़ों को अधिक आत्मविश्वास देगा, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि लोग अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझें।

आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानूनी बहस को और तेज कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि संसद को अब इस दिशा में स्पष्ट कानून बनाना चाहिए, ताकि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों के अधिकार और दायित्व पूरी तरह परिभाषित हो सकें। साथ ही, समाज को भी इन रिश्तों को स्वीकार करने के लिए और जागरूक होने की जरूरत है।
नागरिकों से अपील: जागरूकता और समझ
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए समाज को यह संदेश दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप को नकारात्मक दृष्टि से देखने के बजाय उसे समझने और स्वीकार करने की जरूरत है। नागरिकों से अपील है कि वे इस फैसले को खुले दिमाग से देखें और अपने रिश्तों में पारदर्शिता और सहमति को प्राथमिकता दें। यह फैसला न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी प्रतीक है, जो भारत को एक प्रगतिशील समाज की ओर ले जाएगा।

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