मंत्री बढ़ाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल
संवाददाता
10 April 2025
अपडेटेड: 9:36 AM 0thGMT+0530
मंत्री बढ़ाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल
कोर्ट ने मंज़ूर की याचिका
दिल्ली सरकार में मंत्रियों की संख्या बढ़ाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। वही साथ ही जनहित याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार के पास विधानसभा में 70 विधायक होने के बावजूद सरकार चलाने के लिए 38 विभाग और केवल 7 मंत्री उपलब्ध हैं। वही अब कोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली है।
दिल्ली हाई कोर्ट उस याचिका पर विचार के लिए मान गया, जिसमें दिल्ली सरकार में मौजूदा कैबिनेट में मंत्रियों की संख्या सात से बढ़ाने की मांग की गई है। कोर्ट ने कहा कि इस पर विचार करने की जरूरत है। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से कई सवाल पूछे और 28 जुलाई को सुनवाई की तारीख तय की।
जनहित याचिका में बताया गया है कि दिल्ली सरकार के पास विधानसभा में 70 विधायक होने के बावजूद सरकार चलाने के लिए 38 विभाग और केवल 7 मंत्री हैं। याचिका में बताया गया कि यह किसी भी राज्य में मंत्रियों की अब तक की सबसे कम संख्या है। वही गोवा में 40 और सिक्किम 32 विधायकों के साथ कम से कम 12 मंत्री हैं। साथ ही याचिकाकर्ता आकाश गोयल ने अपनी याचिका में बताया है कि दिल्ली को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच एक अनोखा दर्जा भी प्राप्त है।
एडवोकेट कुमार उत्कर्ष के माध्यम से दायर याचिका में संविधान के अनुच्छेद 239 एए को भी चुनौती दी गई है, वही जिसने दिल्ली में मंत्रिपरिषद को विधानसभा के कुल सदस्यों के सिर्फ 10 प्रतिशत तक सीमित कर रखा है। साथ ही याचिका में बताया गया है कि यह लिमिटेशन मनमानी, भेदभावपूर्ण और संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन है, साथ ही विशेष रूप से संघवाद, लोकतांत्रिक शासन और प्रशासनिक दक्षता के सिद्धांतों को कमजोर करती थी।
याचिका में दावा किया गया कि दिल्ली अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के समान नहीं है और अनुच्छेद 239 एए के आधार पर, इसे अन्य केंद्र शासित प्रदेशों से अलग करते हुए ‘सुई जेनेरिस’ (अपनी तरह का एक) दर्जा दिया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली की तुलना अन्य राज्यों से नहीं की जा सकती, क्योंकि इसे एक विशेष संवैधानिक योजना के साथ ‘स्टैंडअलोन’ दर्जा हासिल है और इसे अलग तरीके से शासित किया जा रहा है।
बेंच ने बताया कि अगर दिल्ली की इस अनूठी संवैधानिक स्थिति को स्वीकार कर लिया गया है, तो याचिकाकर्ता यहां किसी भी संवैधानिक व्यवस्था की तुलना अन्य राज्यों से कैसे कर सकता है। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 164 (1 ए) पेश किया गया था, जिसमें कहा गया कि सभी राज्यों में सीएम सहित मंत्रियों की कुल संख्या संबंधित विधान सभा के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। वही इसके अलावा, यह निर्धारित किया गया था कि किसी भी राज्य में 12 से कम मंत्री नहीं होंगे साथ ही लेकिन इस संशोधन ने अनजाने में दिल्ली को बाहर कर दिया, वही जिससे शासन ढांचे में असंगतता पैदा हो गई।
याचिका में बताया गया है साथ ही अनुच्छेद 164 के अनुरूप अनुच्छेद 239 एए में संशोधन करने में केंद्र सरकार की निष्क्रियता ने दिल्ली के निवासियों को उनके समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हुए प्रभावी और आनुपातिक शासन से वंचित कर दिया गया है। इसमें बताया गया है कि मंत्रियों की अपर्याप्त संख्या के परिणामस्वरूप प्रशासनिक बाधाएं, नीति कार्यान्वयन में देरी, शासन में अक्षमताएं और मौजूदा मंत्रियों पर अत्यधिक बोझ पड़ा है।