मोहन भागवत का सख्त बयान. जबरन धर्मांतरण को बताया हिंसा का रूप

khabar pradhan

संवाददाता

6 June 2025

अपडेटेड: 10:24 AM 0thGMT+0530

मोहन भागवत का सख्त बयान. जबरन धर्मांतरण को बताया हिंसा का रूप

Mohan Bhagwat's stern statement. Forcibly.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने जबरन धर्मांतरण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने कहा कि जबरन धर्म परिवर्तन एक तरह की हिंसा है जो समाज में तनाव और विभाजन को बढ़ावा देता है. भागवत ने यह बयान एक हालिया कार्यक्रम में दिया जहां उन्होंने देश की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता पर जोर दिया. उनके इस बयान ने एक बार फिर धर्मांतरण के मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है. साथ ही इसने सियासी और सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है.

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की संस्कृति और परंपराएं सभी को जोड़ने वाली हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि जबरन या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना न केवल अनैतिक है बल्कि यह सामाजिक एकता के लिए भी खतरा है. भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म एक व्यक्तिगत आस्था का विषय है और इसे जबरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए. उनके मुताबिक ऐसी गतिविधियां समाज में वैमनस्य फैलाती हैं और देश की मूल भावना के खिलाफ हैं. उन्होंने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे समाज में जागरूकता फैलाएं और लोगों को अपनी संस्कृति के प्रति गर्व करने के लिए प्रेरित करें.

इस बयान के बाद कई संगठनों और नेताओं ने भागवत के विचारों का समर्थन किया है जबकि कुछ ने इस पर सवाल भी उठाए हैं. समर्थकों का कहना है कि जबरन धर्मांतरण एक गंभीर मुद्दा है जिस पर खुले तौर पर चर्चा होनी चाहिए. दूसरी ओर कुछ आलोचकों का मानना है कि इस तरह के बयान धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं. भारत में धर्मांतरण का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है और कई राज्यों में इसके खिलाफ सख्त कानून भी लागू हैं. भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को और सख्त करने की बात चल रही है.

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत की विविधता ही उसकी ताकत है और इसे बनाए रखने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने स्वयंसेवकों से समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचने और उनकी मदद करने का आह्वान किया. उनके इस बयान को आरएसएस की उस विचारधारा से जोड़ा जा रहा है जो सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता पर बल देती है. भागवत के इस रुख ने एक बार फिर साबित किया है कि आरएसएस सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी बात बेबाकी से रखता है.

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