MP High Court का बड़ा फैसला: दूसरे राज्य का OBC सर्टिफिकेट मध्य प्रदेश में नहीं चलेगा.
संवाददाता
2 April 2026
अपडेटेड: 10:51 AM 0ndGMT+0530
2 अप्रैल 2026
ग्वालियर:
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने आरक्षण के नियमों को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी व्यक्ति के पास दूसरे राज्य का अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रमाण पत्र है, तो वह मध्य प्रदेश में आरक्षण का हकदार नहीं होगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला अर्चना दांगी नाम की एक महिला से जुड़ा है, जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की रहने वाली हैं। अर्चना ने साल 2018 में मध्य प्रदेश की उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा पास की थी। लेकिन जब दस्तावेजों की जांच (Document Verification) हुई, तो उनका चयन रद्द कर दिया गया।
चयन रद्द होने की वजह यह थी कि उनका ओबीसी प्रमाण पत्र मध्य प्रदेश का नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी किया गया था।
कोर्ट में क्या तर्क दिए गए?
*अर्चना दांगी की ओर से दलील दी गई कि ‘दांगी’ जाति उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, दोनों ही राज्यों में ओबीसी की सूची में आती है। साथ ही, शादी के बाद अब वे मध्य प्रदेश की स्थायी निवासी हैं, इसलिए उन्हें यहां आरक्षण मिलना चाहिए।
*कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है, न कि शादी या निवास स्थान बदलने से।
अदालत ने अपने निर्णय में कुछ बेहद कड़े और स्पष्ट नियम दोहराए हैं:
* जन्म आधारित आरक्षण: आरक्षण का अधिकार जन्म से मिलने वाले सामाजिक पिछड़ेपन पर निर्भर करता है। शादी के बाद किसी की सामाजिक पहचान तो बदल सकती है, लेकिन आरक्षण की श्रेणी नहीं।
* दूसरे राज्य का प्रमाण पत्र मान्य नहीं: कोई भी व्यक्ति दूसरे राज्य में जाकर अपनी जाति के आधार पर आरक्षण नहीं मांग सकता, भले ही वह जाति उस नए राज्य की ओबीसी लिस्ट में भी शामिल क्यों न हो।
* पति की जाति आधार नहीं: शादी के बाद महिला को उसके पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम पहले भी सुप्रीम कोर्ट और कई अन्य न्यायालयों द्वारा साफ किया जा चुका है। इस फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ है कि मध्य प्रदेश की सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेने के लिए प्रमाण पत्र इसी राज्य का होना अनिवार्य है।