राष्ट्रीय कार्यशाला में वन संरक्षण और जलवायु समर्थ आजीविका पर चर्चा

khabar pradhan

संवाददाता

18 April 2025

अपडेटेड: 9:34 AM 0thGMT+0530

राष्ट्रीय कार्यशाला में वन संरक्षण और जलवायु समर्थ आजीविका पर चर्चा

सीएम ने कहा- टाइगर रिजर्व और सैंक्चुरी बनाना संकट की जड़, आबादियों का विस्थापन गलत

सीएम ने कहा- टाइगर रिजर्व और सैंक्चुरी बनाना संकट की जड़, आबादियों का विस्थापन गलत

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वन संरक्षण और जलवायु समर्थ आजीविका को लेकर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वन संरक्षण नीतियों और टाइगर रिजर्व व सैंक्चुरी के निर्माण पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण के नाम पर बस्तियों को उजाड़ना और स्थानीय आबादियों का विस्थापन करना पर्यावरणीय संकट की जड़ है। इस कार्यशाला में विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन, वन संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन पर विचार-विमर्श किया।


मुख्यमंत्री के बयान का सार
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कार्यशाला में अपने संबोधन में कहा, “हमने टाइगर रिजर्व और सैंक्चुरी बनाईं, लेकिन इसके लिए जंगलों के बीच बसी आबादियों को हटाया गया। यह दृष्टिकोण गलत था। वन और वन्यजीवों का संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसके लिए स्थानीय समुदायों को उजाड़ना उचित नहीं। यही संकट की जड़ है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो स्थानीय लोगों की आजीविका को सुरक्षित रखें।
सीएम ने यह भी कहा कि जंगल और वन्यजीव स्थानीय समुदायों के साथ सह-अस्तित्व में ही फल-फूल सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसी योजनाएं लागू करनी चाहिए, जिसमें वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों को रोजगार और आजीविका के अवसर प्रदान किए जाएं।
कार्यशाला का उद्देश्य
राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन वन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए किया गया था। इस कार्यशाला में निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा हुई:
वन संरक्षण नीतियों का प्रभाव: टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और सैंक्चुरी के निर्माण से स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाला प्रभाव।
जलवायु समर्थ आजीविका: जलवायु परिवर्तन के दौर में स्थानीय समुदायों के लिए टिकाऊ रोजगार के अवसर।
सह-अस्तित्व मॉडल: वन्यजीवों और मानव आबादी के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए नीतियां और प्रथाएं।
पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को वन संरक्षण और जलवायु अनुकूलन में शामिल करना।
विशेषज्ञों की राय
कार्यशाला में शामिल पर्यावरण विशेषज्ञों ने मुख्यमंत्री के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि वन संरक्षण नीतियों को समावेशी बनाना जरूरी है। एक विशेषज्ञ ने कहा, “जंगल केवल वन्यजीवों के लिए नहीं, बल्कि उन समुदायों के लिए भी हैं, जो सदियों से वहां रह रहे हैं। उनकी आजीविका को नजरअंदाज करना न केवल सामाजिक अन्याय है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को भी कमजोर करता है।”
कई विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि वन संरक्षण के लिए सामुदायिक वन प्रबंधन (Community Forest Management) और इको-टूरिज्म जैसे मॉडल को बढ़ावा देना चाहिए। इन मॉडलों से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और वे वन संरक्षण में सक्रिय भागीदार बन सकेंगे।
स्थानीय समुदायों का दृष्टिकोण
कार्यशाला में कुछ आदिवासी और वनवासी समुदायों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि टाइगर रिजर्व और सैंक्चुरी के निर्माण के बाद उन्हें अपनी जमीन और आजीविका से वंचित होना पड़ा। एक प्रतिनिधि ने कहा, “हम जंगल के रक्षक हैं। हमने सदियों से जंगलों को संरक्षित किया है। हमें उजाड़ने के बजाय, हमें संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहिए।”
सरकार की पहल और भविष्य की योजनाएं
मुख्यमंत्री ने कार्यशाला में घोषणा की कि मध्य प्रदेश सरकार ऐसी नीतियां तैयार कर रही है, जो वन संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखें। उन्होंने कहा कि इको-टूरिज्म, वन आधारित उद्यम, और जैविक खेती जैसे क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर सृजित किए जाएंगे। इसके अलावा, सरकार पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण नीतियों में शामिल करने के लिए भी कदम उठाएगी।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
मुख्यमंत्री के इस बयान को लेकर सामाजिक और राजनीतिक हलकों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सीएम के विचारों का स्वागत किया और इसे समावेशी संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया। वहीं, कुछ अन्य ने चिंता जताई कि टाइगर रिजर्व और सैंक्चुरी पर सवाल उठाने से वन्यजीव संरक्षण के प्रयास कमजोर हो सकते हैं।
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की। कांग्रेस के एक नेता ने कहा, “सीएम सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं। अगर वे वास्तव में स्थानीय समुदायों की चिंता करते हैं, तो उन्हें पहले विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।”

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