RSS का अजेय उत्थान: प्रतिबंधों को ठुकराकर कैसे बना भारत की सांस्कृतिक शक्ति?
संवाददाता
25 May 2025
अपडेटेड: 9:17 AM 0thGMT+0530
RSS का अजेय उत्थान: प्रतिबंधों को ठुकराकर कैसे बना भारत की सांस्कृतिक शक्ति?
मोहन भागवत ने उजागर किया रहस्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का नाम आज भारत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 1925 में स्थापित यह संगठन न केवल एक सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति है, बल्कि देश की सियासत और समाज पर इसका प्रभाव भी बेमिसाल है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस संगठन पर 1948 और 1975 में प्रतिबंध लग चुका है, और फिर भी यह हर बार और मजबूत होकर उभरा? हाल ही में RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस सवाल का जवाब देते हुए संगठन की अटूट ताकत का राज खोला। उन्होंने बताया कि कैसे RSS ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी विचारधारा और समर्पण के दम पर भारत के कोने-कोने में अपनी जड़ें मजबूत कीं। आइए, इस प्रेरक कहानी को गहराई से जानते हैं और समझते हैं कि कैसे RSS ने हर तूफान को पार कर एक विशाल वटवृक्ष का रूप लिया।
प्रतिबंधों का दौर: 1948 और 1975 की चुनौतियां
RSS की यात्रा चुनौतियों से भरी रही है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर पहला प्रतिबंध लगा। सरकार ने RSS पर आरोप लगाया कि इसकी विचारधारा ने हिंसा को बढ़ावा दिया, हालांकि बाद में जांच में संगठन को बरी कर दिया गया। फिर 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान RSS पर दूसरा प्रतिबंध लगा। इस दौरान हजारों स्वयंसेवकों को जेल में डाल दिया गया, और संगठन की गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। तीसरा प्रतिबंध 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगा, जब RSS को फिर से निशाना बनाया गया।
इन प्रतिबंधों के बावजूद RSS न केवल जीवित रहा, बल्कि हर बार पहले से कहीं अधिक ताकतवर होकर उभरा। मोहन भागवत ने हाल ही में एक सभा में इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा, “RSS की शक्ति इसकी संपत्ति, संसाधनों या सत्ता में नहीं, बल्कि इसके स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा और आंतरिक शक्ति में है।”
शाखा: RSS की ताकत की नींव
मोहन भागवत ने RSS की सफलता का श्रेय इसकी शाखा प्रणाली को दिया। शाखा, यानी रोजाना सुबह या शाम को होने वाली स्वयंसेवकों की बैठक, RSS की रीढ़ है। इन शाखाओं में शारीरिक प्रशिक्षण, बौद्धिक चर्चा, और सामाजिक सेवा पर जोर दिया जाता है। आज पूरे भारत में 55,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं, जो लाखों स्वयंसेवकों को एकजुट करती हैं।
भागवत ने कहा, “शुरुआत में हमारे पास कुछ भी नहीं था। न संसाधन, न संपत्ति, न सत्ता। लेकिन स्वयंसेवकों का समर्पण और देश के प्रति प्रेम ने हमें अडिग रखा।” शाखा प्रणाली ने न केवल संगठन को एकजुट रखा, बल्कि समाज में इसके प्रभाव को भी बढ़ाया। चाहे प्राकृतिक आपदा हो या सामाजिक संकट, RSS के स्वयंसेवक हमेशा सबसे पहले मदद के लिए पहुंचते हैं, जिसने संगठन को जन-जन तक लोकप्रिय बनाया।
आंतरिक शक्ति: RSS का मूल मंत्र
मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि RSS की ताकत इसकी आंतरिक शक्ति में निहित है। उन्होंने कहा, “सच्ची शक्ति वह नहीं जो बाहर से दिखती है, बल्कि वह जो भीतर से आती है। यह शक्ति विचारधारा, एकता, और समाज के प्रति समर्पण से मिलती है।” भागवत ने हिंदू समाज को भारत की ताकत का केंद्र बताते हुए कहा कि RSS का लक्ष्य हिंदू समाज को संगठित और सशक्त करना है, ताकि भारत राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के मामले में आत्मनिर्भर बन सके।
RSS की विचारधारा हिंदुत्व पर आधारित है, जिसे संगठन भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखता है। लेकिन भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि RSS का हिंदुत्व समावेशी है, जो सभी धर्मों और समुदायों को साथ लेकर चलता है। यह विचारधारा न केवल स्वयंसेवकों को प्रेरित करती है, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे को भी बढ़ावा देती है।
प्रतिबंधों से मजबूती: संघ का अटल विश्वास
1948, 1975, और 1992 के प्रतिबंधों ने RSS को कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन हर बार संगठन ने इन चुनौतियों को अवसर में बदला। 1948 में प्रतिबंध हटने के बाद RSS ने अपनी गतिविधियों को और विस्तार दिया। 1975 के आपातकाल में स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया, जिसने उनकी विश्वसनीयता को और बढ़ाया। 1992 के बाद भी RSS ने सामाजिक सेवा और संगठन के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया।
मोहन भागवत ने इस बारे में कहा, “प्रतिबंधों ने हमें और मजबूत किया। जब समाज ने देखा कि हम बिना किसी स्वार्थ के देश के लिए काम करते हैं, तो लोगों का विश्वास बढ़ता गया।” यह विश्वास ही RSS की ताकत का सबसे बड़ा आधार है।
सामाजिक सेवा: RSS की लोकप्रियता का राज
RSS की ताकत का एक बड़ा कारण इसकी सामाजिक सेवा है। चाहे 2004 का सुनामी हो, 2013 का उत्तराखंड आपदा हो, या कोविड-19 महामारी, RSS के स्वयंसेवकों ने हर संकट में समाज की मदद की। भोजन वितरण, रक्तदान शिविर, और आपदा राहत कार्यों में RSS की भूमिका ने इसे जनता के बीच एक भरोसेमंद संगठन बनाया।
मोहन भागवत ने इस पर जोर देते हुए कहा, “हमारा काम सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए है। हमारी शक्ति हमारे स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा में है।” यह सेवा भाव ही RSS को अन्य संगठनों से अलग करता है।
सोशल मीडिया पर चर्चा: RSS की ताकत का जश्न
मोहन भागवत के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर RSS की ताकत और योगदान की चर्चा जोरों पर है। एक यूजर ने लिखा, “RSS की शक्ति इसके स्वयंसेवकों का समर्पण है। प्रतिबंधों के बावजूद यह संगठन आज भारत की सबसे बड़ी ताकत है।” वहीं, एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, “मोहन भागवत ने सही कहा, RSS की ताकत इसकी विचारधारा और एकता में है।”
हालांकि, कुछ लोग RSS की विचारधारा पर सवाल भी उठाते हैं। कुछ यूजर्स ने इसे हिंदुत्व के प्रचार से जोड़ा और संगठन पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया। लेकिन RSS समर्थकों का कहना है कि संगठन का उद्देश्य समाज को एकजुट करना है, न कि विभाजन करना।
RSS का भविष्य: 100 साल का जश्न और नई जिम्मेदारी
2025 में RSS अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर रहा है। इस मौके पर मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को नई जिम्मेदारी लेने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा, “हमें भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर, और समृद्ध राष्ट्र बनाना है। इसके लिए हमें समाज के हर वर्ग को साथ लेना होगा।”
RSS की यह यात्रा न केवल संगठन की ताकत को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे एक विचारधारा और समर्पण किसी संगठन को विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रख सकता है।
RSS की ताकत, भारत का गौरव
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1948, 1975, और 1992 के प्रतिबंधों को न केवल सहा, बल्कि हर बार और मजबूत होकर उभरा। मोहन भागवत ने साफ किया कि RSS की ताकत इसकी संपत्ति या सत्ता में नहीं, बल्कि इसके स्वयंसेवकों के समर्पण, शाखा प्रणाली, और सामाजिक सेवा में है। आज RSS न केवल भारत का सबसे बड़ा संगठन है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का प्रतीक भी है।
यह कहानी न केवल RSS की ताकत की गवाही देती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्चा समर्पण और विचारधारा किसी भी चुनौती को पार कर सकती है। RSS की यह यात्रा हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है, और इसका 100वां साल इस संगठन की अटूट शक्ति का जश्न मनाने का अवसर है।