प्लास्टिक कचरे से स्ट्रीट फर्नीचर. अनोखी पहल ने बढ़ाया भारत का मान
संवाददाता
7 June 2025
अपडेटेड: 6:21 AM 0thGMT+0530
Street furniture made from plastic waste.
भारत में प्लास्टिक कचरे को कम करने और पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक अनोखी पहल शुरू हुई है. लद्दाख के एक चायवाले ने दुकानों से इकट्ठा किए गए प्लास्टिक कचरे से टिकाऊ स्ट्रीट फर्नीचर बनाने की शुरुआत की है. इस पहल को मशहूर पर्यावरणविद् और नवप्रवर्तक सोनम वांगचुक ने भी सराहा है. उनका दावा है कि यह फर्नीचर 100 साल तक टिक सकता है. यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दे रही है बल्कि स्थानीय समुदायों को रोजगार भी प्रदान कर रही है.
इस पहल के तहत दुकानों और घरों से एकत्रित प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल कर बेंच, टेबल और अन्य स्ट्रीट फर्नीचर बनाए जा रहे हैं. यह प्रक्रिया न केवल कचरे को कम करती है बल्कि इसे उपयोगी और टिकाऊ उत्पादों में बदल देती है. इस प्रक्रिया में प्लास्टिक को पिघलाकर विशेष मोल्ड्स में ढाला जाता है जिससे मजबूत और मौसम प्रतिरोधी फर्नीचर तैयार होता है. इस पहल ने स्थानीय लोगों को कचरे के प्रति जागरूक करने में भी मदद की है.
सोनम वांगचुक, जिन्हें फिल्म थ्री इडियट्स के किरदार फुंसुक वांगडू के प्रेरणास्रोत के रूप में जाना जाता है, ने इस पहल की जमकर तारीफ की है. उन्होंने इसे पर्यावरण और नवाचार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम बताया. वांगचुक का कहना है कि यह पहल न केवल प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में मददगार है बल्कि यह स्थानीय स्तर पर आर्थिक विकास को भी बढ़ावा दे रही है. उन्होंने इस मॉडल को देश के अन्य हिस्सों में लागू करने की वकालत की.
इस पहल में स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी देखी जा रही है. लोग न केवल प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने में मदद कर रहे हैं बल्कि फर्नीचर बनाने की प्रक्रिया में भी शामिल हो रहे हैं. इससे न केवल पर्यावरण को लाभ हो रहा है बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिल रहे हैं. इस प्रक्रिया में महिलाएं और युवा विशेष रूप से सक्रिय हैं जो इस पहल को सामाजिक बदलाव का एक हिस्सा बनाता है.
इस पहल ने न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई है बल्कि अन्य शहरों और कस्बों के लिए भी एक मॉडल प्रस्तुत किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. यह पहल साबित करती है कि छोटे स्तर पर शुरू किए गए प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं. भविष्य में इस मॉडल को और बड़े पैमाने पर लागू करने की योजना है.