UGC Protest: यूजीसी के नए बिल को लेकर क्यों मचा है बवाल:

khabar pradhan

संवाददाता

27 January 2026

अपडेटेड: 3:45 PM 0thGMT+0530

UGC Protest: यूजीसी के नए बिल को लेकर क्यों मचा है बवाल:

क्या है यूजीसी के नए नियम और क्यों मचा हुआ है हंगामा:

जातिगत भेदभाव को रोकने का हवाला देकर यूजीसी ने कुछ नए नियम बनाए हैं।

यूजीसी द्वारा लागू किया गया समानता का बिल 2026 वास्तव में एक गाइडलाइंस है जिसे 15 जनवरी 2026 को देश के सभी कॉलेज और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए सिर्फ नोटिफाई किया गया है।
अभी इस बिल को संसद से पारित नहीं किया गया है किंतु इसके संवैधानिक प्रारूप को लेकर बहस जारी है।
अब इन नए नियमों को लेकर हर तरफ बवाल बचा हुआ है। यूजीसी के यह नए नियम क्या है और किसने बनाए हैं यह नियम और इस बिल को यूजीसी को क्यों लाना पड़ा आईए जानते हैं–
यूजीसी के यह नियम यूनिवर्सिटी और कॉलेज में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं। जिसके अनुसार हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक कमेटी बनेगी ,जो एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतें सुनेगी और एक निश्चित समय में उसका निपटारा करेगी।
जो कैंपस में छात्रों के बीच बराबरी का माहौल बनाएगी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए योजनाएं भी लागू करेगी।
इस नए बिल का नाम है प्रमोशन आफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026।

यूजीसी के अनुसार इन नियमों में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से बताया गया है जो एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह का प्रत्यक्ष ,अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार को भेदभावपूर्ण माना जाएगा । जिससे किसी भी छात्र की गरिमा या शिक्षा में समानता को कम करता हो, वह भी भेदभाव पूर्ण रवैया माना जाएगा।
फिर इस मामले की शिकायत छात्रों द्वारा कमेटी को की जा सकती है और फिर दोषी छात्र पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस बिल में यह जातिगत भेदभाव की परिभाषा इतनी व्यापक रूप से की गई है कि जिसका दुरुपयोग बहुत आसानी से किया जा सकता है।   इसमें नए नियम जातिगत भेदभाव को काफी विस्तृत रूप से बढ़कर पेश किया गया है।  इस नए नियम में जाति, धर्म,  लिंग ,जन्म का स्थान,विकलांगता इन सब के आधार पर कोई भी पक्षपाती व्यवहार यदि किया जाएगा, जिससे छात्रों के बीच पढ़ाई में व्यवधान उत्पन्न हो या एससी, एसटी या ओबीसी वर्ग के छात्रों की गरिमा के खिलाफ हो उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा।

बिल के दुरुपयोग की भयावहता:

जातिगत भेदभाव की परिभाषा को इतने व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है कि यदि कोई भी छोटी-मोटी बहस को भी भेदभाव का नाम देना काफी आसान हो जाएगा।  जिससे झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ जाएगा।
ऐसे में कोई भी सामान्य छात्र या सवर्ण शिक्षक पर अपमानजनक व्यवहार का आरोप लगाना काफी आसान हो जाएगा । जिससे यह छोटी बहस भेदभाव रोकने के बजाय कई अन्य विवादों को भी जन्म देगी ।जिससे सवर्ण छात्र या शिक्षक पर खतरा उत्पन्न होगा। और स्वयं उनकी ही पढ़ाई बाधित होगी। इस बिल के बाद सवर्ण छात्रों को फंसाने के लिए झूठी शिकायतें बढ़ सकती हैं।  कोई भी छात्र या शिक्षक सवर्ण छात्र पर भेदभाव का आरोप लगा सकता है।‌ उसे किसी भी तरह का डर नहीं होगा।  क्योंकि यह नियम भेदभाव रोकने के बजाय नए झगड़े पैदा कर सकता है।
इसके पहले सिर्फ एक ही ड्राफ्ट में एससी एसटी के खिलाफ भेदभाव की बात की गई थी किंतु इसके बाद ओबीसी वर्ग को भी इसमें शामिल किया गया है।
इस बिल के बाद सवर्ण छात्रों पर दबाव बढ़ सकता है। नियम को एक तरफ बताया गया है । इसके अलावा सवर्ण छात्रों के खिलाफ भेदभाव की शिकायत की सुनवाई पर कोई भी प्रावधान नहीं दिया गया है।

झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान नहीं होने की वजह से स्वर्ण छात्रों में बेहद गुस्सा है उन्हें यह महसूस हो रहा है कि यह नियम उनके खिलाफ बनाए गए हैं जिसका दुरुपयोग बहुत आसानी से हो सकता है।
इस बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है इस बिल के खिलाफ यूनिवर्सिटी और कॉलेज में प्रदर्शन हो रहे हैं।
लोगों का कहना है कि यह बिल भेदभाव रोकने के बजाय नया भेदभाव पैदा करने हेतु बिल है।

यह नियम यूजीसी को क्यों लाने पड़े:

यूजीसी द्वारा लगे बनाए गए नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाए गए हैं जिसमें साल 2025 में रोहित विमला और पायल तडवी जैसे मामलों की सुनवाई के दौरान यूजीसी को 8 हफ्तों में सख्त नियम बनाने को कहा गया था।
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला और मुंबई मेडिकल कॉलेज की पायल तडवी ने जातिगत उत्पीड़न झेलने के बाद सुसाइड कर लिया था।  इन मामलों के बाद उनके परिवार जनों ने याचिका दाखिल की ,जिसमें भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाने हेतु अपील की गई थी।

किंतु इस नए बिल का विरोध तेज हो गया है और यूजीसी पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह तुरंत इन नियमों को वापस करें । जिसे देखकर कई जगह प्रदर्शन हो रहे हैं।
इस बीच सरकार ने भी आश्वासन दिया है कि सही तथ्य छात्रों के सामने रखे जाएंगें।
दिल का गलत इस्तेमाल ना हो और सभी वर्गों का समान प्रतिनिधित्व हो।

फिलहाल यह मामला देश भर में तेजी से फैल रहा है और कई संगठन यूजीसी के इस नियम को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

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